शनिवार, 12 जनवरी 2013

सपने प्यार के


आँखों में शोले लिए मैं कहाँ से कहाँ आ निकला,
जो घर जला कर आया वह तो  अपना निकला।
             लोगो ने पागल करार दिया फेके पत्थर मुझपर,
             जब मैं लोगो के घर के बराबर से .......  निकला ,
जहाँ  था फूलों उपवन परिंदे  करते थे गुलजार,
वहीं मौत की वीरानियाँ  लिए श्मशान निकला।
             जिन आँखों में दिखता था कभी सपने प्यार के,
             उन्ही पलको में आँसू ....  का समन्दर निकला।
जिन हाथो के पकड़ सोचा कर लेगे दुनियाँ फतह,
पीछे मुडकर देखा उन्ही  हाथो में खंजर निकला।
             साथ क्यों छोड़ जाते है कुछ कदम चलने के बाद,
             संजोये ... ख्वाब टूट गये जब सामने से निकला।
तुम अगर कभी समझ पाओ तो मुझे भी समझाना,
देवो का नकाब लगाये कातिलो का लश्कर निकला।


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17 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी लगी आपकि सपने प्यार की प्रस्तुती

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  2. राजेन्‍द्र जी सबसे पहले तो आपसे माफी चाहूगा कि आपके ब्‍लाग पर बहुत समय बाद आया हू
    आपकी रचना बहुत अच्‍छी लगी
    ब्‍लाग को ज्‍वाईन कर लिया है युनिक तकनीकी ब्‍लाग पर आपका स्‍वागत हैा

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    उत्तर
    1. विनोद जी आपका धन्यबाद।आपका ब्लॉग तो सर आँखों पर।

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  3. जिन हाथो के पकड़ सोचा कर लेगे दुनियाँ फतह,
    पीछे मुडकर देखा उन्ही हाथो में खंजर निकला।

    ...बहुत सुन्दर भावमयी अभिव्यक्ति...

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  4. एक बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल।पीछे मुडकर देखा तो उन्ही हाथो में खंजर निकला ,क्या बात है।

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  5. लाजबाब ग़ज़ल,सपने प्यार के।

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  6. जिन हाथो के पकड़ सोचा कर लेगे दुनियाँ फतह,
    पीछे मुडकर देखा उन्ही हाथो में खंजर निकला।
    amazing ,ye bda dilchasp shaer hai.

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  7. बहुत सुन्दर भावमयी अभिव्यक्ति......

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  8. जिन आँखों में दिखता था कभी सपने प्यार के,
    उन्ही पलको में आँसू .... का समन्दर निकला।

    बहुत सुंदर प्रस्तुति.

    लोहड़ी, पोंगल, मकर संक्रांति और बिहू की बधाइयाँ.

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  9. सार्थक प्रस्तुती,बहुत ही सुंदर।

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