शुक्रवार, 29 मार्च 2013

खुबसूरत लम्हा






 

खुबसूरत कोई लम्हा नही मिलने वाला,
एक हँसता हुआ चेहरा नही मिलने वाला।
 
तेरे हसीन चेहरे को नींद में भी नहीं भूलता,
यूं ही रेतो पर चलने से नही मिलने वाला.
 
तब मेरे दर्द को महसूस करेगें लेकिन,
मेरी खातिर मसीहा तो नही मिलने वाला।
 
वे वजह अपनी निगाहों को परेशा मत करो,
वक्त के भीड में अपना नही मिलने वाला।
 
जाने क्या रंग बदल ले वो सितमगर अपना,
अब किसी से कहीं तन्हा नही मिलने वाला।
 
ऐ "राज"तुमने चिरागों को बुझाया क्योंकर,
इन अँधेरे में तो साया नही मिलने वाला।



मंगलवार, 26 मार्च 2013

हाइकू: होली आयी







१.
रंग -रंगीली
उड़े  रंग गुलाल
आई रे होली
 
२.
बरसे रंग
अबरक केशर
होली पे आज
 
३.
थोडा सा रंग
गुलाल की बौछार
साजन संग
 
४.
चुनरी उड़ी
सतरंगों में रंगी
हवा के संग
 
५.
रंगों की धूम
बरबस लुभाती
प्रेम की होली
 
६.
रूप अनोखा
हुड़दंगो की टोली
मदमस्त हैं
 
७.
भांग मिठाई
पिया के संग होली
आई बहार
 
८.
रंग तरंग
बाजे ढोल मंजीरा
छायी है मस्ती  
 
९.
उषा की लाली
आँगन में रंगोली
छायी खुशियाँ



आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ !






 

रविवार, 24 मार्च 2013

जोश में होश खोना



 
उतेजना ,भावना और जोश हमारी मानवीय गुण हैं जीवन में हम कभी कभी बहुत ही जोशिलें हो जाते हैं. क्या सही है क्या बुरा इसका ख्याल ही नहीं रह जाता है. जोश में आना बुरा नही है परन्तु होश के साथ.बिना होश का जोश विनाशक होता है.इसका बैज्ञानिक कारण यह है की जब हम जोश में होश खोते हैं तो उस स्थिति में हमारी श्वाँस की लय बिगड़ जाती है ,हमारे मस्तिष्क में आक्सीजन की आपूर्ति नही हो  है.इसका परिणाम यह होता है की दिमाग सही निर्णय नही ले पता है की क्या बुरा है सही और हमारे से गलत कार्य हो जाता है.इसी बात पर आज के नेता(हमारे कर्णधार) की कहानी को लेते हैं.........                                                                                                                                               नाव चली जा रही थी। बीच मझदार में नाविक ने कहा,
"नाव में बोझ ज्यादा है, कोई एक आदमी कम हो जाए तो अच्छा, नहीं तो नाव डूब जाएगी।"
अब कम हो जए तो कौन कम हो जाए? कई लोग तो तैरना नहीं जानते थे: जो जानते थे उनके लिए नदी के बर्फीले पानी में तैर के जाना खेल नहीं था।
नाव में सभी प्रकार के लोग थे-,अफसर,वकील,, उद्योगपति,नेता जी और उनके सहयोगी के अलावा आम आदमी भी।
सभी चाहते थे कि आम आदमी पानी में कूद जाए।
उन्होंने आम आदमी से कूद जाने को कहा, तो उसने मना कर दिया।
बोला, जब जब मैं आप लोगो से मदत को हाँथ फैलता हूँ कोई मेरी मदत नहीं करता जब तक मैं उसकी पूरी कीमत न चुका दूँ , मैं आप की बात भला क्यूँ मानूँ? "
जब आम आदमी काफी मनाने के बाद भी नहीं माना, तो ये लोग नेता के पास गए, जो इन सबसे अलग एक तरफ बैठा हुआ था।
इन्होंने सब-कुछ नेता को सुनाने के बाद कहा, "आम आदमी हमारी बात नहीं मानेगा तो हम उसे पकड़कर नदी में फेंक देंगे।"
नेता ने कहा, "नहीं-नहीं ऐसा करना भूल होगी। आम आदमी के साथ अन्याय होगा। मैं देखता हूँ उसे - नेता ने जोशीला भाषण आरम्भ किया जिसमें राष्ट्र,देश, इतिहास,परम्परा की गाथा गाते हुए, देश के लिए बलि चढ़ जाने के आह्वान में हाथ
ऊँचा करके कहा,
ये नाव नहीं हमारा सम्मान डूब रहा है "हम मर मिटेंगे, लेकिन अपनी नैया नहीं डूबने देंगे… नहीं डूबने देंगे…नहीं डूबने देंगे"….
सुनकर आम आदमी इतना जोश में आया कि वह नदी के बर्फीले पानी में कूद पड़ा।

"दोस्तों पिछले 65 सालो से आम आदमी के साथ यही तो होता आया है "

शुक्रवार, 22 मार्च 2013

हाइकू :नवजीवन


 
१.
मेरी ही छाया
करती मेरी पीछा
भागता रहा
२.
मन भी सदा
रहता  चिन्तन में
अँधियारा है
३.
करता रहा
रौशनी की तलाश
व्यर्थ का काम
४.
चलती नैया
साहिल के सहारे
लम्बा सफर
५.
अंजाना रास्ता
जोश पर सागर
भटकते हैं
६.
थमा तूफान
छट गया अँधेरा
निकला चाँद
७.
सूरज उगा
मिला नवजीवन
आई बहार
 
 

विशेष : प्रिय मित्रों मैं  हाइकू लिखने का अभी प्रयास ही कर रहा हूँ,इसके मर्म को समझने का कोशिस कर रहा हूँ.आपसब से मार्गदर्शन की आशा है.

 

बुधवार, 20 मार्च 2013

"घर के दरमियाँ"






कितनी दीवारें उठी हैं एक घर के दरमियाँ
घर कहीं गुम हो गया दीवारो-दर के दरमियाँ.

कौन अब इस शहर में किसकी ख़बरगीरी करे
हर कोई गुम इक हुजूमे-बेख़बर के दरमियाँ.

जगमगाएगा मेरी पहचान बनकर मुद्दतों
एक लम्हा अनगिनत शामो-सहर के दरमियाँ.

एक साअत थी कि सदियों तक सफ़र करती रही
कुछ ज़माने थे कि गुज़रे लम्हे भर के दरमियाँ.

वार वो करते रहेंगे, ज़ख़्म हम खाते रहें
है यही रिश्ता पुराना संगो-सर के दरमियाँ.

किसकी आहट पर अंधेरों के क़दम बढ़ते गए
रहनुमा था कौन इस अंधे सफ़र के दरमियाँ.

बस्तियाँ 'मखमूर' यूँ उजड़ी कि सहरा हो गईं
फ़ासले बढ़ने लगे जब घर से घर के दरमियाँ
.
 
 
 "कहीं पे गम तो कहीं पर खुशी अधूरी है मुझे मिली है जो दुनिया बडी अधूरी है"-शायर मखमूर सईदी जी भावभीनी श्रधान्जली के साथ उनकी रचना.

रविवार, 17 मार्च 2013

कैसी ये सरकार


  कैसी ये सरकार
  झुठ-फरेब का ही
  कर रही व्यापार
  गूंगे बहरे बने रहने में
  सोचती है भलाई
  दुश्मन देते घाव पर घाव
  न किया कभी भी
  उन पर फुँफकार
  अमन चैन को तरसती
  बेबस जनता
  हो रही भेड़ियों के शिकार
  न्याय कानून का रास्ता
  केवल गरीबों को नापता
  बाहुबली खुले घूम रहें
  खद्दर टोपी के साये में
  महंगाई हर पल बढ़ रही
  सुरसा के मुहँ की तरह
  नेता बैठे ए सी केबिन में
  बजाते हैं केवल गाल
  आम जनता जी रही
  बेबसी और लाचारी में
  मस्ती में घूम रहें
  नेता और शिकारी
  न करता कोई 
  दिल से इनका विरोध
  लूट रहे हैं लूटने दो
  आज उनका दौर है
  कल हमारा भी होगा



 

बुधवार, 13 मार्च 2013

हाइकू:गर्मी के दिन




१.
बेछत घर
तड़पती जिन्दगी
झुलसते हैं
२.
व्याकुल मन
तपता अंगनारा
छाया सन्नाटा
३.
चुभती धूप
गर्मी से अकुलाये
छिपे परिन्दे
४.
थके पथिक
छाया को तरसते
जलते पांव
५.
आग लगाये
सूखे कण्ठ कोकिला
गर्मी के दिन
६.
पेड़ों की छाया
जेठ की दुपहरी
बात निराली
७.
हो रही शाम
लालिमा आकाश में
छिपता सूरज
८.
दिन तपता
खुद ही सिमटता
रात सुहानी
 
 







 

रविवार, 10 मार्च 2013

कामयाबी की मंजिलें



 

हर तरफ छाया है अँधेरा
दिखता नही सवेरा
जिन्दगी में है बेरुखी का आलम
हर डाल के पत्ते है सुर्ख
खो गया है मंजिलों के रास्ते
नहीं रहा अब खुशियों से वास्ता
जिन्दगी के इम्तिहाँ
तोड़ रहें मेरा हौसला
रुकने के कगार पर
जिन्दगी के कामयाबी के कारवाँ
मेरे जज्बात उड़ रहें
बिपरीत हवाओं के साथ
जिन्दगी की तन्हाई लग रही
तूफान के बाद छाये सन्नाटे की तरह
खुशी के नगमे भी लगते
दर्द भरी शायरी की तरह
जिन्दगी के उलझे हैं सारे तार
मकड़ी की जालों की तरह
अब तो दोस्तों की सलाहियत भी
लगते रेगिस्तानी काँटों की तरह
पर,
जिन्दगी टूट कर बिखरने से पहले
सोये आत्मविश्वास में
हुआ एक उजाला सबेरा
लगता अब तोड़ पाउँगा
उलझनों का तिलस्म
जीवन है संघर्ष 
लड़कर ही इसे पाना है
अब दूर नहीं रही
मेरी कामयाबी की मंजिलें. 
 

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

मौसम: हाइकू



१.
देखता रहा
बदलते मौसम
छाया अँधेरा
 
२.
हवा के झोंके  
पुल्कित पेड़-पौधे
सिमट गये
 
३.
दिशा बदले
उड़ते हुए पंक्षी
लौट के आये
 
४.
उमड़े मेघ
रिम-झिम  बारिस
बरस गये
 
५.
धरा के रंग
फैली है हरियाली
सुहाना लगे
 
६.
अँधेरी रात
बादलों की ओट से
झाँकता चाँद
 
७.
तारे सितारे
उड़ रहे जुगनू 
चमकते हैं
 
८.
खिला गगन
महकता चमन
फैली चाँदनी



 

गुरुवार, 7 मार्च 2013

अंधविश्वास का रूप



हम बहुत सी परम्पराओं, अंधविश्वासों को बिना कुछ विचार किये ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेते हैं. यह भी नहीं देखते कि आज के परिपेक्ष्य में इसकी कोई प्रासंगिकता है भी या नहीं इसके पीछे कोई तर्क संगत आधार है कि नहीं. कहीं अंधविश्वास का तो हम अनुपालन नहीं कर रहे हैं. हमारी बहुत सी मान्यताएं विज्ञान / आधुनिक ज्ञान की कसौटी पर खरी नहीं उतरती हैं.यह हमारी बेड़ियाँ बन जाती हैं. समाज के विकास और प्रगति के लिए इन बेड़ियों को तोड़ देना ही बेहतर होगा. एक गतिशील समाज को अपनी मान्यताओं / परम्पराओं की सार्थकता पर निरंतर विचार करते रहना चाहिए. जो मान्यताएं समय के अनुरूप हों, समाज की प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती हों, उन्हें ही स्वीकृति मिलनी चाहिए आधारहीन परम्पराएं किस प्रकार अंधविश्वास का रूप ले लेती हैं।
                                       इसी सन्दर्भ में एक प्राचीन कहानी को देखते हैं।

 एक फकीर किसी बंजारे की सेवा से बहुत प्रसन्‍न हो गया। और उस बंजारे को उसने एक गधा भेंट किया। बंजारा बड़ा प्रसन्‍न था।

बुधवार, 6 मार्च 2013

खफा-ए-जिन्दगी



 

 
खफा-ए -जिन्दगी  को भुला कर के  तो देखिए ,
ख्वाबो की दुनियाँ से निकल कर के तो देखिए ।
 
तेरी यादों के  ही  सहारे जी  रहें हैं  अब तलक,
दिल के झरोंखे में कोई दीप जला कर के देखिए। 
 
हम समझ न पाए अब तक आपकी रुसवाई को,
नस्तरे दिल से अपना इल्जाम हटा के तो देखिए।
 
दस्ताने-ए-दिल को मेरी जुबां से  सुना ही नही,
तिलिस्मे बेहिसी को कभी तोड़  के तो देखिए।
 
दर्दे-दिल को सहते हुए कितने सदियाँ गुजर गयी,
अपने माजी के मजार पर कभी आ कर के देखिए।
 
लगता अब उतर जायेंगे लहद में अहबाब के कांधों से,
रब के दर पर मेरे गुनाहों की सजा सुना कर तो देखिये। 
 
 
अर्थ:  तिलिस्मे =भवंर जाल, माजी=अतीत, मजार =कब्र, लहद=कब्र, अहबाब=मित्र जन 
 
 
चलते चलते प्रस्तुत है:
                                करोगे याद गुजरे हसीन यादों को,
                                         तरसोगे हमारे साथ एक पल बिताने को।
                                                         फिर आवाज दोगे हमें बुलाने को,
                                                                 नहीं दरवाजा होगा स्वर्ग से वापस आने का।।


सोमवार, 4 मार्च 2013

खुद के विवेक



अंधविश्वास पर नहीं खुद के विवेक पर भरोसा करें

 
 


आज भी बड़े पदों पर बैठे कई लोग आपको मिल जायेंगे, जो लकी नंबर, लकी कलर और लकी डे के आधार पर ही काम करते हैं. हर डीलिंग और हर प्रोजेक्ट के पहले ज्योतिषीय सलाह उनके लिए जरूरी होता है. अगर आप भी उसी श्रेणी में आते हैं, तो अब खुद के विवेक पर भरोसा करना शुरू कर दें.इसी संदर्भ में एक कहानी को देखें और मनन करें.
 
एक राजा अपने सारे काम ज्योतिषी से मुहूर्त निकलवा कर किया करते. एक बार उनका मन शिकार पर जाने का किया. राज ज्योतिषी से पूछा, तो उसने बताया- गणना के अनुसार आज का दिन शिकार के लिए बड़ा शुभ है.

रविवार, 3 मार्च 2013

कट गयी दीवार





 

गर्दे हैरत से अट  गयी दीवार,
आइना देख कट गयी दीवार।
 
लोग  वे मंजरों से डरा करते थे ,
अब के काया पलट गयी दीवार,
 
सर को टकराने हम कहाँ जाएँ,
शहरे बहशत से पट गयी दीवार।
 
इस कदर  टूट का मिला वह शख्स,
मेरे अन्दर की  फट गयी  दीवार।
 
गम  ऐ  वक्त  के  सितम टूटे,
जब मेरे कद से हट गयी दीवार।
 
हम लतीफा सुना के जब लौटे,
कहकहो  से लिपट गयी दीवार।
 
फासलें और बढ़ गयी ऐ राज,
घर से घर की सट गयी दीवार।

दीवार क्या गिरी मेरे खस्ता मकान की,
लोगों  ने मेरे सेहन में रास्ते बना लिये।
                                                                                                                                     (साभार:अज्ञात )

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

माँ,तुम्हारी यादें





माँ,
आज आ रही है 
तुम्हारी यादें बहुत 
तन्हा छोड़ मुझे 
जल्दी चली गयी तू 
हर पल रखा 
मेरी  ही खुशियों का ख्याल 
कभी भी न आने दी आँखों में नमी 
अब हर पल रहती 
तेरी यादों में आँखें नम 
तुम्हारी लोरियों की गूंज 
अब भी गूंज रही कानो में 
नहीं कर पा  रहा समझौता 
वीराने जिन्दगी से
आदत जो रही 
तुम्हारी प्यार दुलार का 
दुलार भरा हाथों का स्पर्श 
महसूस करता स्वप्निल नींद में 
फूलों जैसे  गोद में मचलना 
तुम्हारा मुस्कराना 
नींद से जग जाता अचानक 
ढूढने लगता तुम्हार चेहरा 
चमकते चाँद सितारों में 
माँ,तुम याद आ रही हो बहुत। 









 

You might also like :

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...