मंगलवार, 24 सितंबर 2013

आपका साथ


जिस दिन से 
तुम आई मेरी जिंदगी मे 
जीवन के प्रत्येक दिन 
मानो दिवाली है. 
तुम से दूर रहकर 
नही कर सकता कल्पना 
हर पल महसुस करता 
अंतरात्मा की आवाज 
जिस में हम एक साथ 
कर रहें हैं वीणा का वादन 
साथ बिताये हसींन लम्हे 
हरपल आँखों के सामने 
मानों चल रहा है चलचित्र 
अपनी आँखों के सपने 
पाता हूँ तुम्हारी आँखों में 
जीवन का अपना हर धागा 
है सुलझा हुआ 
दिल की आत्मीयता दिव्य बन जाता है.
आपकी बाँहों का सहारा 
मुझे लगता है मुझे मिल गया है 
पूरी दुनिया के आकर्षण 
हमारा प्यार एक मंदिर की तरह 
जीवन के हर उतार चढाव में 
मिला हमेशा तुम्हारा साथ 
धन्य है उस इश्वर का 
जो भेजा तुम्हे हमारी 
जिन्दगी में।

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शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

हैरानी से डरते हैं



अजब हैं लोग थोड़ी सी परेशानी से डरते हैं
कभी सूखे से डरते हैं, कभी पानी से डरते हैं

तब उल्टी बात का मतलब समझने वाले होते थे
समय बदला, कबीर अब अपनी ही बानी डरते हैं

पुराने वक़्त में सुलतान ख़ुद हैरान करते थे
नये सुलतान हम लोगों की हैरानी से डरते हैं

हमारे दौर में शैतान हम से हार जाता था
मगर इस दौर के बच्चे तो शैतानी से डरते हैं

तमंचा ,अपहरण, बदनामियाँ, मौसम, ख़बर, कालिख़
बहादुर लोग भी अब कितनी आसानी से डरते हैं

न जाने कब से जन्नत के मज़े बतला रहा हूँ मैं
मगर कम-अक़्ल बकरे हैं कि कुर्बानी से डरते हैं
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ये रातों-रात कुछ का फूलना, फलना, चमक जाना
हमें बतलाओ इस करतब में क्या तकनीक होती है
                                                                                                                                      आभार: सर्वत एम् ज़माल

शनिवार, 7 सितंबर 2013

धरा के रंग



१. 
धरा के रंग 
सजी-सँवरी दुल्हन 
सुहाने लगे 

२. 
स्वर्ण सा दिखे 
चाँद की चाँदनी में 
अमलताश  

३. 
ओस की बूंदें 
घास  पर पसरी 
मानो  है मोती 

४. 
ओस बेचारी 
जीवन मनोरम 
रात का साथ

५. 
छटा बिखेरे 
चंद्रमा की किरणे 
स्वच्छ चाँदनी 

६. 
भोर की हवा 
जीवन का अमृत 
निरोगी काया 

७. 
हुआ सवेरा 
आकाश की लालिमा 
सुहानी  लगे  


रविवार, 1 सितंबर 2013

मानव की शक्ति




मानव में गर शक्ति होती 
प्रार्थना की उत्पति न होती 
मानव में गर भक्ति होती 
प्रार्थना की संतति  न होती। 
मानव में गर विरक्ति होती 
लोभ-वृति कतई न होती 
शक्ति,भक्ति,विरक्ति,
प्रार्थना की देन है बन्धु !
कहता है सत-चित-ज्ञान सिन्धु 
विन्दु में झरे बिन सिन्धु 
सुज्ञान की वर्षा  न होती 
जहाँ पर मति सोती 
वहाँ कलह होती।  
घर,गावँ,शहर में होती 
प्रदेश और देश में होती 
मानव में गर शक्ति होती 
दानव की उत्पति न होती। 
प्रार्थना में है शक्ति 
शक्ति में है भक्ति 
भक्ति में है विरक्ति 
विरक्ति में है जीवन 
जीवन ग्रहण कीजिये 
मरना को मुक्ति दीजिये 
इसी में है बहु-जन हित 
इसी में है देश हित। 

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