मंगलवार, 11 फ़रवरी 2014

"परमात्मा के चरणो में पूर्ण समर्पण"




समर्पण के बिना स्वतंत्रता उपलब्ध नही हो सकती। जब तक परमात्मा के प्रति हम पूर्ण रूप से समर्पित नहीं होते, 'मैं' के अहंकार को नही छोड़ते तब तक हम चारो तरफ से बन्धनों  में जकड़े रहेंगे।  इस मैं का अहंकार छोड़ कर अपने आपको प्रभु-अपर्ण करके ही हम मुक्त हो सकते हैं। 'मैं' को हम परमात्मा के चरणो में चढ़ाकर, 'मैं', नहीं  'तू' कहना और समझना शुरू कर  दें। मैं की  जगह तू को लेट ही दुखों का बोझ मिट जाता है, छूट जाता है। हमेशा उस निरंजन, निराकार, निर्विकार, अनन्त , महान  और दिव्य परमात्मा के साथ रहें, उसके साथ होने का अनुभव करें और पूरी पूर्णता के साथ करें। उस अदृस्य और असीम की  ध्वनि कानों से सुनने कि कोशिश करते रहें।  धीरे-धीरे इस प्रकार के सतत प्रयास से हमें दुःख,शोक और अज्ञान के सभी बंधनों से मुक्त हो कर आनन्द  को उपलब्ध हो जायेंगे। " श्री हरि शरणागति ही सब शुभ अशुभ कर्म बन्धनों से मुक्त होने का एक मात्र मार्ग है। जो शरणागत हुए वे ही तर गए। भगवान् ने उन्हें तारा,उन्हें तारते हुए भगवान् ने उनके अपराध नहीं देखे,उनकी जाति या कुल का बिचार नहीं किया। भगवान् केवल भाव की अनन्यता देखते हैं। "

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