शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

"अपने आप को जानें और पहचानें"

हमारी ज्यादा रूचि सिर्फ दूसरों को जानने और अपनी जान पहचान बढ़ाने में ही रहती है, खुद अपने को जानने में नहीं रहती। हमारी यह भी कोशिश रहती है कि अधिक से अधिक लोग हमें जानें, हम लोकप्रिय हों पर यह कोशिश हम जरा भी नहीं करते कि हम खुद के बारे में जानें कि हम क्या हैं, क्यों हैं, क्यों पैदा हुए हैं, किसलिए पैदा हुए हैं। हम हमारे बारे में जो कुछ जानते हैं वह दरअसल हमारे खुद के बारे में जानना समझते हैं जबकि यह एक गलतफहमी है क्योकि जो जो 'हमारा' है वह 'हम' नहीं हैं, यहां तक की हमारा 'शरीर' भी दरअसल 'हम' नहीं बल्कि 'हमारा' है। इस स्थिति से हमारा बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है। हमारा जीवन व्यतीत होता जा रहा है और हमें अभी तक यहीं मालूम नहीं है कि हम क्या हैं, क्यों है आदि। हमारा पूरा ध्यान बाहरी धन सम्पदा, परिवार, मकान, दुकान, घर गृहस्थी पर लगाये रहते हैं, और जो असली हम हैं उसे याद तक नही करते। इससे हम बाहर बाहर भले ही सम्पन्न हों, पर भीतर से दरिद्र होते जा रहें हैं। इसको समझने के लिए एक बोध कथा को देखते हैं।   
                                               "एक बहुत बड़े भवन में आग लग गई और तेज हवा के कारण देखते-देखते आग पूरे भवन में फ़ैल गई।  आग को बुझाने के लिए घर के लोग और पड़ोसी मिलकर सामान निकलने लगे।  मकान मालिक के परिवार का हाल बेहाल था और उन्हें कुछ सूझ नही रहा था। सामान निकालने वालों ने पूछा की कुछ और अंदर तो नही रह गया है, हमें बता दो। घर के लोग बोले -हमारे होश ठिकाने नहीं है, कृपया आप ही लोग देख लें। थोड़ी देर में आग पर काबू पाया गया तो घर का मालिक दिखाई नही दे रहा था जबकि आग लगने के पहले घर में ही सो रहा था।  घर वाले रोने पीटने लगे।  सबने मिलकर जो जो हमारा था वह तो बचा लिया पर इसका ज्ञान किसी को नही था की मकान मालिक अंदर सो रहा है सो वह अंदर ही जल गया।  ऐसा ही हमारे बारे में हो रहा है।  हम समान बचाने में लगे हुए हैं और खुद का हमें पता नही। "

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

निदा फाजली: भावपूर्ण श्रद्धांजलि!

मशहूर शायर और फिल्म गीतकार निदा फाजली का 78 वर्ष की उम्र में सोमवार को मुंबई के वर्सोवा स्थित घर पर निधन हो गया। वे काफी दिनों से बीमार चल रहे थे। सोमवार दोपहर को हार्ट अटैक से उनकी सांसे थम गईं। निदा फाजली साहित्य अकादमी, पद्म श्री सम्मान से सम्मानित थे।निदा फाजली का जन्म 1938 में दिल्ली के कश्मीरी परिवार में हुआ था। उनका बचपन और जवानी ग्वालियर में बीता। यहीं से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। 1957 में ग्वालियर कॉलेज से ग्रैजुएट हुए फाजली ने छोटी उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था। वर्ष 2013 में उन्हें पद्म श्री पुरस्कार से और सांप्रदायिक सद्भाव पर लेखन के लिए उन्हें ‘राष्ट्रीय सद्भाव पुरस्कार’ से भी नवाजा गया था।
      निदा फाजली (फाइल फोटो)
भावपूर्ण श्रद्धांजलि!


दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है

अच्छा-सा कोई मौसम तन्हा-सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है

बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है

ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है

ये वक्त जो तेरा है, ये वक्त जो मेरा
हर गाम पर पहरा है, फिर भी इसे खोना है

आवारा मिज़ाजी ने फैला दिया आंगन को
आकाश की चादर है धरती का बिछौना है

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