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बुधवार, 12 जुलाई 2017

आँखों की विशेषता-Specialty of eyes

हमारे शरीर के सभी अंगों में सिर्फ आँखें ही ऐसा एकमात्र अंग है जिसका हमारी मनोभावना से सीधा सम्बन्ध होता है। आँखें हमारी मनोभावना की अभिव्यक्ति करती है, अन्य कोई अंग नहीं करता। हमारी आँखें दिल का आईना होती है, जैसा कि अंग्रेजी में कहा गया है - Face is the Index of the heart. आँखों की स्थिति ऐसी की कोई लज्जाजनक बात देखते ही आँखें शर्म से झुक जाती है। उडी हृदय को आनंद की अनुभूति होती है तो आँखें चमकने लगती है; क्रोध पैदा होते ही आँखें जल उठती है और करुणा भाव यदि पैदा हो जाए तो आँखों में आसूं छलक उठते हैं
                                                        आँखें मन और भाव का दर्पण हैं। भावनाओं एवं संवेदना की स्पष्ट छाप इसकी गहराई में अंकित होती है। आंखें वह द्वार हैं, जिसमें प्रवेश कर अंतरात्मा की झलक−झाँकी पाई जा सकती है। आँखों में व्यक्ति का व्यक्तित्व झलकता है। आँखों के आधार पर व्यक्तित्व की पहचान की जाती है। आँखों की भाषा की महता और उपयोगिता उस समय बहुत बढ़ जाती है जब बोलने की स्थिति न हो, जरूरत न हो और इच्छा न हो। ऐसे हालात में वाणी का काम आँखें किया करती है इसलिए आँखों पर विवेक का नियंत्रण रखना जरुरी हो जाता है। आँखें मन का भेद खोल देती है इसलिए किसी को देखते समय इस बात को ख्याल रखना होगा की आँखें किस भाव की अभिव्यक्ति कर रही है।

नशीली आँखों से वो जब हमें देखते हैं 
हम घबराकर ऑंखें झुका लेते हैं 
कौन मिलाए उनकी आँखों से ऑंखें 
सुना है वो आँखों से अपना बना लेते है .


सोमवार, 28 जनवरी 2013

मेरा लक्ष्य





                           इसी से अपने  लक्ष्य को पता  नहीं हूँ,
                           मैं सच कहने से कभी घबड़ाता नही हूँ।
                                         मेरी आदत में ही है सुमार सच व्यानी,
                                         खुशामद  के गीत  गा पाता  नही  हूँ।
                           जो  देते हैं  दूसरों के आँखों में  आँसू,
                           उनके पर कतरने में कतराता नही हूँ।
                                         देवता वर्ग के लोग हो गये है आसुरी 
                                         उनके चरण-स्पर्श को मैं जाता नही हूँ।
                           जितने उजले कपड़े उतने ही मीठे बोल,
                           उन कपट रूपी झांसे में मैं आता नहीं हूँ।
                                         खुद सीढ़ी दर  सीढ़ी चढ़ते  जायेंगे,
                                         उन बदशक्ल  डंडो पर जाता नही हूँ।
                          मेरी खातिर तो मसीहा तो नही मिलने वाला,
                          इसी से अपने लक्ष्य ........... को पता नहीं हूँ।



चलते चलते एक कतरा  याद  आ गया ...........
                                      "बन्दूक का खेल खेलने वाले ,
                                                   बन्दूक से ही जान  गवाते हैं।
                                                             पड़ोस  के घर में आग लगाने वाले,
                                                                       अपना घर भी बचा नहीं  पाते  हैं।

रविवार, 9 दिसंबर 2012

सिक्के के दो पहलू


हर ख़ुशी की आँखों में आँसू  मिले,
एक ही सिक्के के दो पहलू  निकले।
               कौन अपनाता मिला दुर्गन्ध को,
               हर किसी की चाह है खुशबु मिले।
अपने अपने हौसले की बात है,
सूर्य से भिड़ते हुए जुगनू मिले।
              रेत से भी निकल सकता है तेल,
              चाहत है वो कहीं बालू---- मिले।
आँकियें उन्माद -मद -तूफ़ान का,
सैकड़ो उड़ते हुए तम्बू----- मिले।

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