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शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

इन्सान को इन्सान समझिये



ताकत पे सियासत की ना गुमान कीजिये, 
इन्सान हैं इन्सान को इन्सान समझिये। 

यूँ पेश आते हो मनो नफरत हो प्यार में, 
मीठे बोल न निकले क्यूँ जुबां की कटार से। 

खुद जख्मी हो गये हो अपने ही कटार से, 
सच न छुपा पाओगे अपने इंकार से। 

आँखें  भुला के दिल के आईने में झाकिये, 
इन्सान हो इन्सान को इन्सान ही समझिये। 

कैसी ख़ुशी है आप को ऐसे आतंक से ?
कैसा सकुन बहते हुए खून के रंग से ?

तलवारों खंजरों में क्यूँ किया सिंगार  है, 
आप भी दुश्मन हैं आपके इस जंग में। 

खुद से न सही अपने आप से डरिये, 
इन्सान हो इन्सान को इन्सान समझिये। 

खुद का शुक्र है आप भी इन्सान हैं, 
इंसानियत से न जाने क्यूँ अनजान हैं। 

शुक्र कीजिये की खुदा मेहरबान है, 
वरना आप कौन ? क्या पहचान है। 

सच यही है, अब तो ये जान लीजिये, 
इन्सान हो इन्सान को इन्सान समझिये। 



बुधवार, 26 दिसंबर 2012

पत्थर से इन्सान



सोचा था कि अब चला गया हवाओं की  तरह,
गम दुसरे दिन फिर आ गया दीवानों की तरह।

पत्थर से इन्सान  के रिश्ते होते है बड़े अजीब ,
ठोकर किसी ने मारी कोई जल चढ़ा कर गया।

आया तो ऐसा आया नदियों में सैलाबों की तरह,
गया तो ऐसा गया जंगल की दनावल  की तरह।

सोचा था आएगा बिखरे चमन को बसाने के लिए,
पर आया भी तो लहरों  से झोपडी उड़ाने  के लिए।

सोचा की कट  जाएगी जिन्दगी भवरों की तरह,
गम दुसरे दिन फिर आ गया दीवानों  की तरह।






गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

रौशनी- गज़ल

मसरूफ हुए इतने हम दीप जलाने में,
घर को ही जला बैठे दिवाली मनाने में।
            ये दौर गुजरा है बस उनको मनाने में,
            क्या होगा खुदा अब अगले जमाने में।
मिट्टी के घरौदे वो याद  आज भी आते हैं,
 हम तुम बनाते थे बचपन के जमाने मैं।
            लग जाएगी लगता है अब और कई सदियाँ,
            इस दौर के  इंसा--  को  इन्सान  बनाने  में।
देखा जो तुम्हे मैंने महसूस हुआ यारब,
सदियाँ तो लगी होगी ये शक्ल बनाने में।
            हँस कर मुझे न देखो जज्बात जल न उठे,
            अब  चिंगारी ही काफी है आग लगाने में।
सब तुम पर निछावर  है वस  निछावर  है,
है रौशनी जितनी भी "राज" के खजाने में।





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