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सोमवार, 29 सितंबर 2014

"अपनी काबलियत पर भरोसा"




खुद की क्षमताओं पर भरोसा होना आत्मविश्वास का जरूरी हिस्सा है। कुछ लोग स्वाभाविक रूप से आत्मविश्वासी होते हैं, तो कुछ को इसे विकसित करने की जरूरत होती है। अपनी काबलियत पर हमें हमेशा विश्वास करना चाहिए, क्योंकि जीवन में हमें अपना आत्म विश्वास और अपनी काबलियत ही आगे ले जाती है। खुद में आत्मविश्वास पैदा करने की जरूरत है। अपनी उपलब्धियों पर नजर डालें। अक्सर अभावों के बारे में सोचने के कारण अपनी क्षमता और प्रतिभा का बेहतर इस्तेमाल नहीं कर पाते। आत्मविश्वास में सुधार करने की दिशा में काम करें। तनाव की स्थितियों में बेहतर कार्य करने का कौशल विकसित करें। सकारात्मक लोगों के साथ रहें। यदि आपको अपने चुने हुए मार्ग पर विश्वास है, और इस पर चलने का साहस और मार्ग की हर कठिनाई को जीतने की शक्ति है, तो आपका सफल होना निश्चित है। इसी संदर्भ में एक कहानी से कुछ सीखते हैं ……… 
 बहुत समय पहले की बात है , एक राजा को उपहार में किसी ने बाज के दो बच्चे भेंट किये । वे बड़ी ही अच्छी नस्ल के थे , और राजा ने कभी इससे पहले इतने शानदार बाज नहीं देखे थे।राजा ने उनकी देखभाल के लिए एक अनुभवी आदमी को नियुक्त कर दिया।जब कुछ महीने बीत गए तो राजा ने बाजों को देखने का मन बनाया , और उस जगह पहुँच गए जहाँ उन्हें पाला जा रहा था। राजा ने देखा कि दोनों बाज काफी बड़े हो चुके थे और अब पहले से भी शानदार लग रहे थे ।राजा ने बाजों की देखभाल कर रहे आदमी से कहा, ” मैं इनकी उड़ान देखना चाहता हूँ , तुम इन्हे उड़ने का इशारा करो ।इशारा मिलते ही दोनों बाज उड़ान भरने लगे , पर जहाँ एक बाज आसमान की ऊंचाइयों को छू रहा था , वहीँ दूसरा , कुछ ऊपर जाकर वापस उसी डाल पर आकर बैठ गया जिससे वो उड़ा था।                                                            
              ये देख , राजा को कुछ अजीब लगा.“क्या बात है जहाँ एक बाज इतनी अच्छी उड़ान भर रहा है वहीँ ये दूसरा बाज उड़ना ही नहीं चाह रहा ?”, राजा ने सवाल किया।” जी हुजूर , इस बाज के साथ शुरू से यही समस्या है , वो इस डाल को छोड़ता ही नहीं।”राजा को दोनों ही बाज प्रिय थे , और वो दुसरे बाज को भी उसी तरह उड़ना देखना चाहते थे।अगले दिन पूरे राज्य में ऐलान करा दिया गया कि जो व्यक्ति इस बाज को ऊँचा उड़ाने में कामयाब होगा उसे ढेरों इनाम दिया जाएगा।फिर क्या था , एक से एक विद्वान् आये और बाज को उड़ाने का प्रयास करने लगे , पर हफ़्तों बीत जाने के बाद भी बाज का वही हाल था, वो थोडा सा उड़ता और वापस डाल पर आकर बैठ जाता।
                                                         फिर एक दिन कुछ अनोखा हुआ , राजा ने देखा कि उसके दोनों बाज आसमान में उड़ रहे हैं। उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ और उन्होंने तुरंत उस व्यक्ति का पता लगाने को कहा जिसने ये कारनामा कर दिखाया था।वह व्यक्ति एक किसान था।अगले दिन वह दरबार में हाजिर हुआ। उसे इनाम में स्वर्ण मुद्राएं भेंट करने के बाद राजा ने कहा , ” मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ , बस तुम इतना बताओ कि जो काम बड़े-बड़े विद्वान् नहीं कर पाये वो तुमने कैसे कर दिखाया। ““मालिक ! मैं तो एक साधारण सा किसान हूँ , मैं ज्ञान की ज्यादा बातें नहीं जानता , मैंने तो बस वो डाल काट दी जिसपर बैठने का बाज आदि हो चुका था, और जब वो डाल ही नहीं रही तो वो भी अपने साथी के साथ ऊपर उड़ने लगा।

प्रिये मित्रों, हम सभी ऊँचा उड़ने के लिए ही बने हैं। लेकिन कई बार हम जो कर रहे होते है उसके इतने आदि हो जाते हैं कि अपनी ऊँची उड़ान भरने की , कुछ बड़ा करने की काबलियत को भूल जाते हैं।


बुधवार, 18 जून 2014

दूसरों से तुलना दुःख का कारण

हमारे दुःख का एक कारण यह भी है कि हम दूसरों के सुखों से अपनी तुलना करते रहते है कि उसके पास ज्यादा है,मेरे पास कम है। जो हमें मिला है यदि उसी पर ध्यान हो तो दुखी नहीं होंगे क्योंकि दुःख तो तुलना से आता है,जब अपने से ज्यादा खुशहाल व्यक्ति से तुलना करोगे तो दुःख आएगा और अपने से नीचे व्यक्ति से अपनी तुलना करोगे तो अहंकार उभर कर आएगा कि 'मैं बड़ा हूँ' ! इसप्रकार ज़िन्दगी भर किसी न किसी से तुलना करके सुखी-दुखी होते रहते है। क्योंकि मन को दुःख की विलासिता भी बड़ी अच्छी लगती है इसलिए जान बूझकर मन दुःख को कहीं न कहीं से ढूंढ लाता है। और यही हमारे विकास का सबसे बड़ा रोड़ा बन जाता है हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम मन को बार-बार ऊँचे से ऊँचा विचार देते रहे और अपने को किसी कार्य में व्यस्त रखे क्योंकि खाली मन दुःख ही लेकर आता है। जब मन विचार सहित व्यस्त नहीं होता तब अस्त-व्यस्त हो जाता है।
                   आपने कई बार कुछ लोगों को ऐसा कहते
सुना होगा, 'मुझे अपने जीवन में न्याय नहीं मिला। मुझे भेदभाव का सामना करना पड़ा। मेरे आस पास ऐसे लोग हैं जिन्हें सब कुछ आसानी से मिल जाता है। कई लोगों को अपने जीवन में रत्ती भर भी दुख या कष्ट का सामना नहीं करना पड़ा। उन के पास बड़े-बड़े आलीशान मकान है और मैं एक छोटे से फ्लैट में रहता हूं। वह कोई ठोस काम भी नहीं करता, फिर भी उसे मुझसे ज्यादा तारीफ मिलती है।हमारा बहुत समय अक्सर दूसरों के साथ अपनी तुलना करने में ही निकल जाता है। क्या ऐसी तुलना सकरात्मक या फलदायी होती है? दोनों फलों के अपने गुण हैं। दोनों दो तरह के हैं। दोनों को एक ही तरह से नहीं आंका जा सकता। इसी तरह हर एक आत्मा अपने आप में एक अलग पहचान लिए होती है। हमारे कर्म पुरुषार्थ के साथ मिल कर तय करते हैं कि हमें क्या मिलता है और क्या नहीं मिलता। तुलना करना गलत नहीं है, यदि वह स्वस्थ तुलना है और हम किसी को हराने की मंशा से नहीं, अपनी कमियों पर विजय पाने के लिए करते हैं। लेकिन हम सकारात्मक तुलना कम करते हैं। जो हमारे पास है, उससे हम संतुष्ट नहीं हैं और वह सब कुछ पाना चाहते हैं जो दूसरों के पास है। पद, प्रतिष्ठा, संपत्ति या कुछ और जिससे हम समझते हैं कि हमें खुशी मिल सकती है। दूसरों से अपनी तुलना हममें ईर्ष्या और असुरक्षा ही पैदा करती है। इसी संदर्भ में अब एक कहानी पर विचार करते हैं  ……

एक राजा बहुत दिनों बाद अपने बागीचे में सैर करने गया , पर वहां पहुँच उसने देखा कि सारे पेड़- पौधे मुरझाए हुए हैं । राजा बहुत चिंतित हुआ, उसने इसकी वजह जानने के सभी पेड़-पौधों से एक-एक करके सवाल पूछने लगा।
ओक वृक्ष ने कहा, वह मर रहा है क्योंकि वह देवदार जितना लंबा नहीं है। राजा ने देवदार की और देखा तो उसके भी कंधे झुके हुए थे क्योंकि वह अंगूर लता की भांति फल पैदा नहीं कर सकता था। अंगूर लता इसलिए मरी जा रही थी की वह गुलाब की तरह खिल नहीं पाती थी। 
राजा थोडा आगे गया तो उसे एक पेड़ नजर आया जो निश्चिंत था, खिला हुआ था और ताजगी में नहाया हुआ था। 
राजा ने उससे पूछा , ” बड़ी अजीब बात है , मैं पूरे बाग़ में घूम चुका लेकिन एक से बढ़कर एक ताकतवर और बड़े पेड़ दुखी हुई बैठे हैं लेकिन तुम इतने प्रसन्न नज़र आ रहे हो…. ऐसा कैसे संभव है ?” 
पेड़ बोला , ” महाराज , बाकी पेड़ अपनी विशेषता देखने की बजाये स्वयं की दूसरों से तुलना कर दुखी हैं , जबकि मैंने यह मान लिया है कि जब आपने मुझे रोपित कराया होगा तो आप यही चाहते थे कि मैं अपने गुणों से इस बागीचे को सुन्दर बनाऊं , यदि आप इस स्थान पर ओक , अंगूर या गुलाब चाहते तो उन्हें लगवाते !! इसीलिए मैं किसी और की तरह बनने की बजाय अपनी क्षमता केअनुसार श्रेष्ठतम बनने का प्रयास करता हूँ और प्रसन्न रहता हूँ । “

कहने का तात्पर्य है की हमेशा अपने गुणों, अपनी योग्यताओ पर ध्यान केन्द्रित करे। यह जान ले, आप जितना समझते है, आप उससे कही बेहतर है। बड़ी सफलता उन्ही लोगो का दरवाजा खटखटाती है जो लगातार खुद के सामने उचे लक्ष्य रखते है, जो अपनी कार्यक्षमता सुधारना चाहते है।

रविवार, 12 जनवरी 2014

"आत्महत्या समस्या का समाधान नहीं है"


कल ही रात को मुझे एक जानकार के आत्महत्या का समाचार मिला,मन मर्माहत हुआ।  आये दिन हमलोग आत्महत्या कि बढ़ती घटनाओं को सुनते ही रहते है,क्या आत्महत्या किसी समस्या का उचित समाधान है? आत्महत्या करने वालों कि  समस्याएं पर नजर डालें तो इनमे पारिवारिक कलह,दिमागी बीमारी,परीक्षा में असफलता,प्रेम-प्रसंग से आहत ऐसे कई कारण आते हैं।
आत्महत्या का अर्थ जान बूझकर किया गया आत्मघात होता है। वर्तमान युग में यह एक गर्हणीय कार्य समझा जाता है, परंतु प्राचीन काल में ऐसा नहीं था; बल्कि यह निंदनीय की अपेक्षा सम्मान्य कार्य समझा जाता था। हमारे देश की सतीप्रथा तथा युद्धकालीन जौहर इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। मोक्ष आदि धार्मिक भावनाओं से प्रेरित होकर भी लोग आत्महत्या करते थे।
आत्महत्या के लिए अनेक उपायों का प्रयोग किया जाता है जिनमें मुख्य ए हैं: फांसी लगाना, डूबना, गला काट डालना, तेजाब आदि द्रव्यों का प्रयोग, विषपान तथा गोली मार लेना। उपाय का प्रयोग व्यक्ति की निजी स्थिति तथा साधन की सुलभता के अनुसार किया जाता है।
                   कारण कुछ भी हो,आत्महत्या किसी भी तरीके से उचित नही माना  जा सकता।यद्धपि आम तौर पर से आत्महत्या करना कायरता पूर्ण काम माना  जाता है,पर कुछ लोगो कि नजर में आत्महत्या करना बहादुरी का भी काम है,लेकिन मैं कहना चाहूँगा यह बहादुरी वैसी नहीं है जैसी कारगिल के मोर्चे पर हमारे देश के वीर सैनिकों ने प्रदर्शित की। बहादुरी वह होती है जो एक सैनिक या सेनापति की विशेषता होती है और बहादुरी डाकू सरदार कि भी होती है वर्ना वह  डाकू दल का सरदार बन ही नहीं सकता था। फर्क इतना ही होता है कि सैनिक बहादुरी का सही उपयोग करता है और डाकू सरदार बहादुरी का दुरूपयोग करता है,साथ ही कायर भी होता है वरना जंगलों में छिपते फिरने कि क्या जरूरत ? ऐसे ही आत्महत्या करने वाला एक सिक्के के दो पहलुओं की तरह कायर भी होता है और बहादुर भी।

             आत्महत्या करने का कारण जो भी हो पर हर सूरत में आत्महत्या करना गलत काम है। आत्महत्या करने मरने से कर्मगति पीछा थोड़े ही छोड़ देगी बल्कि जीवन को ठुकराने और आत्महत्या करने का एक पाप और बढ़ जाएगा। मर जेन से कुछ हासिल नही होता। जरा यह भी सोचना चाहिए कि "आब तो घबड़ा के ये कहते हैं कि मर जायेंगे,और मर क्र भी चैन न पाया तो किधर जायेंगे।" कैसी भी समस्या हो,विवेक,धैर्य और साहस से काम लेने कि जरूरत होती है। अगर इन तीनों मित्रों का साथ न छोड़ा जाए तो कैसा भी संकट हो अंत में हम विजयी हो ही  जायेंगे। समस्या का समाधान कर ही लेंगे। यह भी यद् रखें ईश्वर भी उन्हीं कि मदद करता है जो अपनी मदद आप खुद करते हैं।

आप भी इस समस्या पर अपने विचार प्रकट करें!     

बुधवार, 15 मई 2013

"सफलता के मूल-मंत्र"(Key of Success)



''गिरते हैं घुड़सवार ही मैदान -ए -जंग में , वो तिफ्ल क्या गिरेंगे जो चलते है घुटनों के बल'' 
अर्थात प्रयास करने वाले को ही ठोकर लग सकती है या संभवत: सफलता या असफलता मिल सकती है,लेकिन  जो प्रयास ही नहीं करते उन्‍हें न सफलता मिल सकती है और न असफलता.
यदि आप सफलता चाहते हैं तो आपको प्रयास तो करना ही पडेगा.आपको कष्टों को अपनाना ही होगा। यदि कष्टों से घबड़ा कर प्रयास ही छोड़ देंगे तो फिर सफलता के बारे में सोचना ही बेकार है. जीवन में सफलता पाने के लिये आशावादी होना चाहिये.निराशा आपको गहरे खन्दक में ले जायेगी.चिंता चिता के समान है. चिंता को त्यागना अत्यावश्यक है। यदि आप सोचते हैं कि किसी समस्या को हल किया जा सकता है तो चिंता करने की क्या आवश्यकता है और यदि आप सोचते हैं कि किसी समस्या को हल नहीं किया जा सकता तो चिंता करने से फायदा ही क्या है?
कुछ मूल-मंत्र :
  • हमारा  सफलता का ही  उद्देश्य होना चाहिये,दृढ संकल्प से किया हुआ कार्य अवश्य ही सफल होगा.
  • जीवन में कुछ बातें या घटनाएं संयोगवश हो सकती हैं। लेकिन आप अगर इस इंतजार में रहेंगे कि सब कुछ अपने आप अकस्मात ही आपको हासिल होगा, तो शायद आप सारी जिंदगी इंतजार ही करते रह जाएंगे, क्योंकि संयोग हमेशा तो नहीं हो सकता।
  • स्वयं की गलती को पहचाने,और इसे दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये. दूसरों की गलती निकालना बहुत सरल है किन्तु स्वयं की गलती को स्वीकार करना अत्यन्त मुश्किल लगता  है।
  • गलतियाँ करना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है, गलतियाँ कष्ट देती है पर इसे सुधारने पर हम सफलता के नए द्वार पर होते है.
  • दूसरों की शिकायत करने वाला व्यक्ति हमेशा अशांत रहता है और कभी भी सफल नहीं हो पाता। सफलता और शांति पाने के लिये बेहतर है कि स्वयं को बदलें।
  • महान बनने की कोशिश न करें। ‘मुझे क्या मिलेगा या मेरा क्या होगा’, इसकी चिंता छोड़कर अगर अपने जीवन के लक्ष्य पर ध्यान देंगे और उसका दायरा बढ़ाएंगे, तो आप खुद एक असाधारण व्यक्ति बन जाएंगे।
  • साहसी बनें और किसी अवसर के खो जाने पर कभी भी आँसू न बहायें।अश्रु कायर बहाते हैं।सोचना है हम कायर नही है।
  • जीवन में परिवर्तन एक प्राकृतिक नियम है। अतः परिवर्तन को स्वीकार करें। परिवर्तन को स्वीकारने पर अन्य सभी बातें अपने आप ही परिवर्तित हो जायेंगी।
  • विकट परिस्थिति में भी ज्याद दुखी न होकर,विकट परिस्थिति के हटाने के बारे में सोचना चाहिये.हास्य के पात्र न बनें.
  • संभव की सीमाओं को जानने का एक ही तरीका है कि उन से थोड़ा आगे असंभव के दायरे में निकल जाइए।
  • हालांकि कोई भी व्यक्ति अतीत में जाकर नई शुरुआत नहीं कर सकता है, लेकिन कोई भी व्यक्ति अभी शुरुआत कर सकता है और एक नया अंत प्राप्त कर सकता है।  
  • यदि आप में आत्मविश्वास नहीं है तो आप हमेशा न जीतने का बहाना खोज लेंगे।
  • किसी के गुणों की प्रशंसा करने में, अपना समय मत बरबाद मत करो, उसके गुणों को अपनाने का प्रयास करो।
  • बंदरगाह में खड़ा जलयान सुरक्षित होता है जलयान वहां खड़े रहने के लिए नहीं बने होते हैं.
  • एक बार किसी कार्य को करने का लक्ष्य निर्धारित कर लेने के बाद, इसे हर कीमत तथा कठिनाई की लागत पर पूरा करें. किसी कठिन कार्य को करने से उत्पन्न आत्म विश्वास अभूतपूर्व होता है।
  • हम में से जीवन किसी के लिए भी सरल नहीं है. लेकिन इससे क्या? हम में अडिगता होनी चाहिए तथा इससे भी अधिक अपने में विश्वास होना चाहिए. हमें यह विश्वास होना चाहिए कि हम सभी में कुछ न कुछ विशेषता है तथा इसे अवश्य ही प्राप्त किया जाना चाहिए।
  • ग़लतियों से न सीखना ही एकमात्र ग़लती होती है।
  • यह कहना कठिन होता कि असंभव क्या है, क्योंकि विगत का स्वप्न, आज की आशा और कल की वास्तविकता होती है।
  • अधिकांश बड़े लक्ष्य हासिल न हो पाने का कारण यह हैं कि हम छोटी चाजों को पहले करने मे अपना समय बिता देते हैं।  
  • जब तक किसी व्यक्ति द्वारा अपनी संभावनाओं से अधिक कार्य नहीं किया जाता है, तब तक उस व्यक्ति द्वारा वह सब कुछ नहीं किया जा सकेगा जो वह कर सकता है।
  • जीवन की त्रासदी इस बात में नहीं है कि आप अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंचते हैं, त्रासदी तो इस बात की है कि आपके पास प्राप्त करने के लिए कोई लक्ष्य नहीं है।
  •  आपकी प्रतिभा, आपको भगवान का दिया गया उपहार है, आप इसके साथ क्या करते हैं, यह आपके द्वारा भगवान को दिया गया उपहार होता है।
रहिमन मनहि लगाईं कै, देखि लेहू किन कोय
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय

रविवार, 10 मार्च 2013

कामयाबी की मंजिलें



 

हर तरफ छाया है अँधेरा
दिखता नही सवेरा
जिन्दगी में है बेरुखी का आलम
हर डाल के पत्ते है सुर्ख
खो गया है मंजिलों के रास्ते
नहीं रहा अब खुशियों से वास्ता
जिन्दगी के इम्तिहाँ
तोड़ रहें मेरा हौसला
रुकने के कगार पर
जिन्दगी के कामयाबी के कारवाँ
मेरे जज्बात उड़ रहें
बिपरीत हवाओं के साथ
जिन्दगी की तन्हाई लग रही
तूफान के बाद छाये सन्नाटे की तरह
खुशी के नगमे भी लगते
दर्द भरी शायरी की तरह
जिन्दगी के उलझे हैं सारे तार
मकड़ी की जालों की तरह
अब तो दोस्तों की सलाहियत भी
लगते रेगिस्तानी काँटों की तरह
पर,
जिन्दगी टूट कर बिखरने से पहले
सोये आत्मविश्वास में
हुआ एक उजाला सबेरा
लगता अब तोड़ पाउँगा
उलझनों का तिलस्म
जीवन है संघर्ष 
लड़कर ही इसे पाना है
अब दूर नहीं रही
मेरी कामयाबी की मंजिलें. 
 

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