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मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

निदा फाजली: भावपूर्ण श्रद्धांजलि!

मशहूर शायर और फिल्म गीतकार निदा फाजली का 78 वर्ष की उम्र में सोमवार को मुंबई के वर्सोवा स्थित घर पर निधन हो गया। वे काफी दिनों से बीमार चल रहे थे। सोमवार दोपहर को हार्ट अटैक से उनकी सांसे थम गईं। निदा फाजली साहित्य अकादमी, पद्म श्री सम्मान से सम्मानित थे।निदा फाजली का जन्म 1938 में दिल्ली के कश्मीरी परिवार में हुआ था। उनका बचपन और जवानी ग्वालियर में बीता। यहीं से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। 1957 में ग्वालियर कॉलेज से ग्रैजुएट हुए फाजली ने छोटी उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था। वर्ष 2013 में उन्हें पद्म श्री पुरस्कार से और सांप्रदायिक सद्भाव पर लेखन के लिए उन्हें ‘राष्ट्रीय सद्भाव पुरस्कार’ से भी नवाजा गया था।
      निदा फाजली (फाइल फोटो)
भावपूर्ण श्रद्धांजलि!


दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है

अच्छा-सा कोई मौसम तन्हा-सा कोई आलम
हर वक़्त का रोना तो बेकार का रोना है

बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है

ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है

ये वक्त जो तेरा है, ये वक्त जो मेरा
हर गाम पर पहरा है, फिर भी इसे खोना है

आवारा मिज़ाजी ने फैला दिया आंगन को
आकाश की चादर है धरती का बिछौना है

शनिवार, 28 नवंबर 2015

जनता का हक़-ग़ज़ल


जनता का हक़ मिले कहाँ से, चारों ओर ‪दलाली है |
‪चमड़े का दरवाज़ा है और ‪कुत्तों की रखवाली है ||

‪मंत्री, नेता, अफसर, मुंसिफ़ सब जनता के सेवक हैं |
ये जुमला भी प्रजातंत्र के मुख पर ‪भद्दी गाली है ||

उसके हाथों की ‪कठपुतली हैं सत्ता के ‪शीर्षपुरुष |
कौन कहे संसद में बैठा ‪गुंडा और मवाली है ||

सत्ता ‪बेलगाम है जनता ‪गूँगी बहरी लगती है |
कोई उज़्र न करने वाला कोई नहीं ‪सवाली है ||

सच को यूँ ‪मजबूर किया है देखो झूठ बयानी पर |
‪माला फूल गले में लटके पीछे सटी ‪दोनाली है ||

‪दौलत शोहरत बँगला गाड़ी के पीछे सब भाग रहे हैं |
‪फसल जिस्म की हरी भरी है ‪ज़हनी रक़बा खाली है ||

‪सच्चाई का जुनूँ उतरते ही हम ‪मालामाल हुए |
हर सूँ यही हवा है ‪रिश्वत हर ताली ताली है ||

वो ‪सावन के अंधे हैं उनसे मत पूँछो रुत का हाल |
उनकी खातिर हवा ‪रसीली चारों सूँ ‪हरियाली है ||

‪पंचशील के नियमो में हम खोज रहे हैं सुख साधन |
चारों ओर ‪महाभारत है दाँव चढ़ी ‪पञ्चाली है ||

पहले भी ‪मुगलों-अंग्रेजो ने जनता का ‪‎खून पिया |
आज 'विप्लवी' भेष बदलकर नाच रही खुशहाली है ||

साभार :- बी. आर. विप्लवी

गुरुवार, 6 मार्च 2014

"निराशा"

आ समन्दर के किनारे पथिक प्यासा रह गया,
था गरल से जल भरा होकर रुआंसा रह गया।

था सफर बाकि बहुत मजिल अभी भी दूर थी,
हो गया बढना कठिन घिर कर कुहासा रह गया।

लग रहे नारे हजारो छप रही रोज लाखो खबर,
गौर से जब देखा तो बन तमाशा रह गया।

एक बुत गढ ने लगी अनजान में ही मगर,
हादसा ऐसा हुआ की वह बिन तराशा रह गया।

छोड़ कर आशा किसी का चल पड़ा बेचारा"राज",
आज वादा  लोगो का बस दिलासा रह गया।


शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

मसीहा



झूठ सच्चाई का हिस्सा हो गया
इक तरह से ये भी अच्छा हो गया

उस ने इक जादू भरी तक़रीर की
क़ौम का नुक़सान पूरा हो गया

शहर में दो-चार कम्बल बाँट कर
वो समझता है मसीहा हो गया

ये तेरी आवाज़ नम क्यूँ हो गई
ग़म-ज़दा मैं था तुझे क्या हो गया

बे-वफाई आ गई चौपाल तक
गाँव लेकिन शहर जैसा हो गया

सच बहुत सजता था मेरी ज़ात पर
आज ये कपड़ा भी छोटा हो गया
****************


झूठ में शक की कम गुंजाइश हो सकती है
सच को जब चाहो झुठलाया जा सकता है


आभार :शकील जमाली

रविवार, 13 अक्तूबर 2013

लौटकर आया नहीं



फूल की बातें सुनाकर वो गया,
किस अदा से वक़्त काँटे बो गया ।

गाँव की ताज़ा हवा में था सफ़र,
शहर आते ही धुएँ में खो गया ।

मौत ने मुझको जगाया था मगर,
ज़िंदगी के फ़लसफ़ों में सो गया ।

मेरा अपना वो सुपरिचित रास्ता,
कुछ तो है जो अब तुम्हारा हो गया ।

पा गया ख़ुदगर्ज़ियों का राजपथ,
रास्ता जो भी सियासत को गया ।

सीख तेरी काम आ जाती मगर,
हाथ से निकला जो अवसर तो गया ।

कौन बतलाए हुआ उस पार क्या,
लौटकर आया नहीं है जो गया ।
***********************

वो सफ़र में साथ है पर इस अदाकारी के साथ ।
जैसे इक मासूम क़ातिल, पूरी तैयारी के साथ ।

                                                                           सादर आभार : विनय मिश्र 

शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

इन्सान को इन्सान समझिये



ताकत पे सियासत की ना गुमान कीजिये, 
इन्सान हैं इन्सान को इन्सान समझिये। 

यूँ पेश आते हो मनो नफरत हो प्यार में, 
मीठे बोल न निकले क्यूँ जुबां की कटार से। 

खुद जख्मी हो गये हो अपने ही कटार से, 
सच न छुपा पाओगे अपने इंकार से। 

आँखें  भुला के दिल के आईने में झाकिये, 
इन्सान हो इन्सान को इन्सान ही समझिये। 

कैसी ख़ुशी है आप को ऐसे आतंक से ?
कैसा सकुन बहते हुए खून के रंग से ?

तलवारों खंजरों में क्यूँ किया सिंगार  है, 
आप भी दुश्मन हैं आपके इस जंग में। 

खुद से न सही अपने आप से डरिये, 
इन्सान हो इन्सान को इन्सान समझिये। 

खुद का शुक्र है आप भी इन्सान हैं, 
इंसानियत से न जाने क्यूँ अनजान हैं। 

शुक्र कीजिये की खुदा मेहरबान है, 
वरना आप कौन ? क्या पहचान है। 

सच यही है, अब तो ये जान लीजिये, 
इन्सान हो इन्सान को इन्सान समझिये। 



शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

हैरानी से डरते हैं



अजब हैं लोग थोड़ी सी परेशानी से डरते हैं
कभी सूखे से डरते हैं, कभी पानी से डरते हैं

तब उल्टी बात का मतलब समझने वाले होते थे
समय बदला, कबीर अब अपनी ही बानी डरते हैं

पुराने वक़्त में सुलतान ख़ुद हैरान करते थे
नये सुलतान हम लोगों की हैरानी से डरते हैं

हमारे दौर में शैतान हम से हार जाता था
मगर इस दौर के बच्चे तो शैतानी से डरते हैं

तमंचा ,अपहरण, बदनामियाँ, मौसम, ख़बर, कालिख़
बहादुर लोग भी अब कितनी आसानी से डरते हैं

न जाने कब से जन्नत के मज़े बतला रहा हूँ मैं
मगर कम-अक़्ल बकरे हैं कि कुर्बानी से डरते हैं
******************************
ये रातों-रात कुछ का फूलना, फलना, चमक जाना
हमें बतलाओ इस करतब में क्या तकनीक होती है
                                                                                                                                      आभार: सर्वत एम् ज़माल

शनिवार, 3 अगस्त 2013

ज़मीन पे जन्नत

कहाँ चला गया बचपन का वो समाँ यारो! 
कि जब ज़मीन पे जन्नत का था गुमाँ यारो! 

बहार-ए-रफ़्ता  को  अब ढूँढें  कहाँ  यारो! 
कि अब निगाहों में यादों की है ख़िज़ाँ यारो! 

समंदरों की तहों से निकल के जलपरियाँ 
कहाँ सुनाती है अब हमको लोरियाँ यारो! 

बुझा-बुझा -सा है अब चाँद आरज़ूओं का 
है माँद-माँद मुरादों की कहकशाँ यारो! 

उफ़क़ पे डूबते सूरज के खूँ की लाली है 
ठहर गये हैं ख़लाओं के क़ारवाँ यारो! 

भटक गये थे जो ख़ुदग़र्ज़ियों के सहरा में 
हवस ने उनको बनाया है नीम जाँ यारो! 

ग़मों के घाट उतारी गई हैं जो ख़ुशियाँ 
फ़ज़ा में उनकी चिताओं का है धुआँ यारो! 

तड़प के तोड़ गया दम हिजाब का पंछी 
झुकी है इस तरह इख़लाक़ की कमाँ यारो! 

ख़ुलूस बिकता है ईमान-ओ-सिदक़ बिकते हैं 
बड़ी अजीब है दुनिया की ये दुकाँ यारो ! 

ये ज़िन्दगी तो बहार-ओ-ख़िज़ाँ का संगम है 
ख़ुशी ही दायमी ,ग़म ही न जाविदाँ यारो ! 

क़रार अहल-ए-चमन को नसीब हो कैसे 
कि हमज़बान हैं सैयाद-ओ—बाग़बाँ यारो! 

हमारा दिल है किसी लाला ज़ार का बुलबुल 
कभी मलूल कभी है ये शादमाँ यारो ! 

क़दम-क़दम पे यहाँ अस्मतों के मक़तल हैं 
डगर-डगर पे वफ़ाओं के इम्तहाँ यारो! 

बिरह की रात सितारे तो सो गये थे मगर 
सहर को फूट के रोया था आसमाँ यारो!

चलते चलते यारों ….

सोच के बन में भटक जायें अगर जागें तो, 
क्यों न देखे हुए ख़्वाबों में ही खो कर देखें।
                                                             आभार-मनोहर शर्मा

शनिवार, 6 जुलाई 2013

दिल का दर्द



दिल का दर्द ज़बाँ पे लाना मुश्किल है
अपनों पे इल्ज़ाम लगाना मुश्किल है

बार-बार जो ठोकर खाकर हँसता है
उस पागल को अब समझाना मुश्किल है

दुनिया से तो झूठ बोल कर बच जाएँ,
लेकिन ख़ुद से ख़ुद को बचाना मुश्किल है।

पत्थर चाहे ताज़महल की सूरत हो,
पत्थर से तो सर टकराना मुश्किल है।

जिन अपनों का दुश्मन से समझौता है,
उन अपनों से घर को बचाना मुश्किल है।

जिसने अपनी रूह का सौदा कर डाला,
सिर उसका ‘राज ’ उठाना मुश्किल है।
****************************
चलते चलते,
मुश्किल चाहे लाख हो लेकिन इक दिन तो हल होती है,
ज़िन्दा  लोगों की  दुनिया में  अक्सर  हलचल  होती है।
                                                                                     आभर :अजीज आजाद 

शुक्रवार, 14 जून 2013

रौनक़-ए-बाज़ार




ये जो दीवाने से दो चार नज़र आते हैं 
इन में कुछ साहिब-ए-असरार नज़र आते हैं

तेरी महफ़िल का भरम रखते हैं सो जाते हैं 
वरना ये लोग तो बेदार नज़र आते हैं

दूर तक कोई सितारा है न कोई जुगनू
मर्ग-ए-उम्मीद के आसार नज़र आते हैं

मेरे दामन में शरारों के सिवा कुछ भी नहीं
आप फूलों के ख़रीदार नज़र आते हैं

कल जिसे छू नहीं सकती थी फ़रिश्तों की नज़र
आज वो रौनक़-ए-बाज़ार नज़र आते हैं


चलते चलते एक शेर पर गौर फरमायें ......

मैं ने पलकों से दर-ए-यार पे दस्तक दी है
मैं वो साहिल हूँ जिसे कोई सदा याद नहीं।

मैं ने जिन के लिये राहों में बिछया था लहू
हम से कहते हैं वही अहद-ए-वफ़ा याद नहीं । 

                                                                              सादर  आभार :साग़र सिद्दीकी

सोमवार, 27 मई 2013

आग नफ़रत की



अब गए वक़्त क़े हर ग़म को भुलाया जाए
प्यार ही प्यार को परवान चढ़ाया जाए

आग नफ़रत की चमन को ही जला दे न कहीं
पहले इस आग को मिल-जुल के बुझाया जाए


सरहदें हैं कोई क़िस्मत की लकीरें तो नहीं
अब इन्हें तोड़ के बिछड़ों को मिलाया जाए

आतशी झील में खिल जाएँ मुहब्बत के कँवल
अब कोई ऐसा ही माहौल बनाया जाए

सिर्फ़ ज़ुल्मों की शिकायत ही करोगे कब तक
पहले मज़लूम की असमत को बचाया जाए

साज़िशें फिरती हैं कितने मुखौटे पहने
उनकी चालों से सदा ख़ुद को बचाया जाए

    **************************   

अब मेरा दिल कोई मजहब न मसीहा मांगे
ये तो बस प्यार से जीने का सलीका माँगे
ऐसी फसलों को उगाने की जरूरत क्या है
जो पनपने के लिए खून का दरिया माँगे   
                                सादर आभार: अजीज आजाद

मंगलवार, 7 मई 2013

जिरह और बयान के झगड़े


 
 
तलफ्फुजों की जिरह और बयान के झगड़े।
गजल की जान न ले लें जबान के झगड़े।।


जब धूप का समन्दर कुल आसमान पर है।
ऐसे में, इक परिन्दा पहली उड़ान पर है।।

 
या रब तू ही बचाना आफत सी जान पर है,
फिर तीर इक नजर का तिरछी कमान पर है।

 
उस पार से मुहब्बत आवाज दे रही है,
दरिया उफान पर है दिल इम्तिहान पर है।

 
राजेन्द्र से भले ही वाकिफ न हो जमाना,
गजलों का उसकी चर्चा सबकी जुबान पर है।

 
*********************************
 
सर पे जिम्मेदारियों का बोझ है, भारी भी है।
डगमगाते पाँवों से लेकिन सफर जारी भी है।
                                                                 आभार :आर.तिवारी
 
 

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

"हैवानियत का आलम'





चारों तरफ अजीब आलम हादसों में पल रही है जिंदगी,
फूलों  के  शक्ल में अंगारों  पर चल  रही है  जिंदगी.

आदमी  खूंखार  वहसी  हो  गए हैं इस जमाने में,
दूध साँपों को पिलाकर खुद तड़प रही है जिंदगी.

हमारी कौम ने जो बाग सींचे थे अपना लहू देकर,
उन्हीं बाग के कलियों का मसलना देख रही है जिंदगी.

उजड रहे हैं रोज गुलशन अब कोई नजारा न रहा,
तलवारों खंजरों रूपी दरिंदों से लुट रही है जिंदगी.

अब  तो यातनाओं  के अंधेरों में ही होता है सफर,
लुट रही बहन-बेटियाँ असहाय बन गयी है जिंदगी.

हर पल सहमी-सहमी है घर की आबरू बहन-बेटियाँ,
हर तरफ  हैवानियत का आलम नीलम ही रही है जिंदगी.

चुभती है  कविता ग़ज़ल सुनाने का न रहा अब हौसला,
 अब तो इस जंगल राज में कत्लगाह बन गयी है जिन्दगी.

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

ज़ख़्मों का आईना


   
हर एक चेहरे को ज़ख़्मों का आईना न कहो
ये ज़िन्दगी तो है रहमत इसे सज़ा न कहो
 
न जाने कौन सी मज़बूरियों का क़ैदी हो
 वो साथ छोड़ गया है तो बेवफ़ा न कहो

तमाम शहर ने नेज़ों पे क्यूँ उछाला मुझे
 ये इत्तेफ़ाक़ था तुम इस को हादसा न कहो

ये और बात कि दुश्मन हुआ है आज मगर
 वो मेरा दोस्त था कल तक उसे बुरा न कहो

हमारे ऐब हमें उँगलियों पे गिनवाओ
 हमारी पीठ के पीछे हमें बुरा न कहो

मैं वाक़ियात की ज़न्जीर का नहीं क़ायल
 मुझे भी अपने गुनाहों का सिलसिला न कहो

ये शहर वो है जहाँ राक्षस भी हैं बहुत
 हर एक तराशे हुए बुत को देवता न कहो

चलते चलते --
अब फिरते हैं हम रिश्तों के रंग-बिरंगे ज़ख्म लिये
सबसे हँस कर मिलना-जुलना बहुत बड़ी बीमारी है


(सादर आभार:राहत इन्दौरी)

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

आने का शुक्रिया



चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया
पत्थर को बुत की शक्ल में लाने का शुक्रिया 
        
जागा रहा तो मैंने नए काम कर लिए
ऐ नींद आज तेरे न आने का शुक्रिया


सूखा पुराना जख्म नए को जगह मिली
स्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया 
        
आती न तुम तो क्यों मैं बनाता ये सीढ़ियाँ
दीवारों, मेरी राह में आने का शुक्रिया


आँसू-सा माँ की गोद में आकर सिमट गया
नजरों से अपनी मुझको गिराने का शुक्रिया 
        
अब यह हुआ कि दुनिया ही लगती है मुझको घर
यूँ मेरे घर में आग लगाने का शुक्रिया
                                           

गम मिलते हैं तो और निखरती है शायरी
यह बात है तो सारे जमाने का शुक्रिया
चलते चलते...    
  

बोलो फिर कैसे कटे, यह जीवन की रात
सुना रहा है हर कोई, बस मुर्दों की बात.
आभार-कुँअर बेचैन



"आप सब को नव सवंत्सर २०७० की हार्दिक मंगलकामनायें"

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

खुबसूरत लम्हा






 

खुबसूरत कोई लम्हा नही मिलने वाला,
एक हँसता हुआ चेहरा नही मिलने वाला।
 
तेरे हसीन चेहरे को नींद में भी नहीं भूलता,
यूं ही रेतो पर चलने से नही मिलने वाला.
 
तब मेरे दर्द को महसूस करेगें लेकिन,
मेरी खातिर मसीहा तो नही मिलने वाला।
 
वे वजह अपनी निगाहों को परेशा मत करो,
वक्त के भीड में अपना नही मिलने वाला।
 
जाने क्या रंग बदल ले वो सितमगर अपना,
अब किसी से कहीं तन्हा नही मिलने वाला।
 
ऐ "राज"तुमने चिरागों को बुझाया क्योंकर,
इन अँधेरे में तो साया नही मिलने वाला।



बुधवार, 20 मार्च 2013

"घर के दरमियाँ"






कितनी दीवारें उठी हैं एक घर के दरमियाँ
घर कहीं गुम हो गया दीवारो-दर के दरमियाँ.

कौन अब इस शहर में किसकी ख़बरगीरी करे
हर कोई गुम इक हुजूमे-बेख़बर के दरमियाँ.

जगमगाएगा मेरी पहचान बनकर मुद्दतों
एक लम्हा अनगिनत शामो-सहर के दरमियाँ.

एक साअत थी कि सदियों तक सफ़र करती रही
कुछ ज़माने थे कि गुज़रे लम्हे भर के दरमियाँ.

वार वो करते रहेंगे, ज़ख़्म हम खाते रहें
है यही रिश्ता पुराना संगो-सर के दरमियाँ.

किसकी आहट पर अंधेरों के क़दम बढ़ते गए
रहनुमा था कौन इस अंधे सफ़र के दरमियाँ.

बस्तियाँ 'मखमूर' यूँ उजड़ी कि सहरा हो गईं
फ़ासले बढ़ने लगे जब घर से घर के दरमियाँ
.
 
 
 "कहीं पे गम तो कहीं पर खुशी अधूरी है मुझे मिली है जो दुनिया बडी अधूरी है"-शायर मखमूर सईदी जी भावभीनी श्रधान्जली के साथ उनकी रचना.

बुधवार, 6 मार्च 2013

खफा-ए-जिन्दगी



 

 
खफा-ए -जिन्दगी  को भुला कर के  तो देखिए ,
ख्वाबो की दुनियाँ से निकल कर के तो देखिए ।
 
तेरी यादों के  ही  सहारे जी  रहें हैं  अब तलक,
दिल के झरोंखे में कोई दीप जला कर के देखिए। 
 
हम समझ न पाए अब तक आपकी रुसवाई को,
नस्तरे दिल से अपना इल्जाम हटा के तो देखिए।
 
दस्ताने-ए-दिल को मेरी जुबां से  सुना ही नही,
तिलिस्मे बेहिसी को कभी तोड़  के तो देखिए।
 
दर्दे-दिल को सहते हुए कितने सदियाँ गुजर गयी,
अपने माजी के मजार पर कभी आ कर के देखिए।
 
लगता अब उतर जायेंगे लहद में अहबाब के कांधों से,
रब के दर पर मेरे गुनाहों की सजा सुना कर तो देखिये। 
 
 
अर्थ:  तिलिस्मे =भवंर जाल, माजी=अतीत, मजार =कब्र, लहद=कब्र, अहबाब=मित्र जन 
 
 
चलते चलते प्रस्तुत है:
                                करोगे याद गुजरे हसीन यादों को,
                                         तरसोगे हमारे साथ एक पल बिताने को।
                                                         फिर आवाज दोगे हमें बुलाने को,
                                                                 नहीं दरवाजा होगा स्वर्ग से वापस आने का।।


रविवार, 3 मार्च 2013

कट गयी दीवार





 

गर्दे हैरत से अट  गयी दीवार,
आइना देख कट गयी दीवार।
 
लोग  वे मंजरों से डरा करते थे ,
अब के काया पलट गयी दीवार,
 
सर को टकराने हम कहाँ जाएँ,
शहरे बहशत से पट गयी दीवार।
 
इस कदर  टूट का मिला वह शख्स,
मेरे अन्दर की  फट गयी  दीवार।
 
गम  ऐ  वक्त  के  सितम टूटे,
जब मेरे कद से हट गयी दीवार।
 
हम लतीफा सुना के जब लौटे,
कहकहो  से लिपट गयी दीवार।
 
फासलें और बढ़ गयी ऐ राज,
घर से घर की सट गयी दीवार।

दीवार क्या गिरी मेरे खस्ता मकान की,
लोगों  ने मेरे सेहन में रास्ते बना लिये।
                                                                                                                                     (साभार:अज्ञात )

मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

तकदीर के मारे




           

             तूफां से डरकर लहरों के बीच  सकारे   कहाँ जाएँ,
             इस जहाँ में भटककर तकदीर के मारे कहाँ जाएँ ।
                              अब तो  खिंजा  भी गुल  खिलाने  लगे है,
                              अपनी बेबसी  को लेकर बहारें कहाँ जाएँ।
            उम्मीदे थी जिसकी चाहत का ...........हमेशा,
            हम तुमसे छुड़ाकर दामन बेसहारे कहाँ जाएँ।
                              उजाला हैं जहाँ में ऐ चाँद तेरी चांदनी से,
                              बता फलक के अभागे सितारे कहाँ जाएँ।
           नाम था लबों पे खुद के बाद तुम्हारा ऐ हंसी,
           तुम्हारे  नाम का वो जहां के लुटेरे कहाँ जाएँ।
                              हंसी मंजर था चाहत के लम्हे गुजरा था ऐ "राज"
                              सिसक-सिसक कर  वो रंगीन नजारें कहाँ जाएँ।

                                              

                              जब  नाव  जल  में छोड़  दी तूफ़ान  में ही  मोड़ दी,
                              दे दी चुनौती सिन्धु को तो धार क्या मझधार क्या !

                                                                                                           (सादर आभार)
                                       

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