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रविवार, 30 जून 2013

'बच्चों के चरित्र निर्माण में अभिभावकों की जिम्मेवारी’


बच्चे ही देश के भविष्य हैं. उनके ‘चरित्र निर्माण’ की जिम्मेवारी पैरेंट्स की है. ऐसे में बच्चों के सामने पैरेंट्स को आदर्श बनना होगा. उनके अच्छे व्यवहार की तारीफ करनी होगी. बच्चे के सामने झगड़ने से बचना होगा. यूं कहें तो एक ऐसी लकीर खींचनी होंगी, जहां बच्चे को लगे कि उनके पैरेंट्स उनका रोल मॉडल हैं. बच्चों के ‘चरित्र निर्माण’ में पैरेंट्स कैसे हो सकते हैं सहायक, इन्हीं बिंदुओं की पड़ताल करता यह आलेख..........
सीमाएं करनी होंगी निर्धारित में अभिभावकों की 
जिन अच्छी आदतों की हमें अपेक्षाएं हैं उसे बच्चों को साफ-साफ बता कर सिखाना होगा. अगर हम चाहते हैं कि बच्चों में अपने ऊपर नियंत्रण हो, वे जिम्मेवारी प्रदर्शित करें. बड़ों के प्रति आभार एवं आदर हो. उनमें किसी समस्या को सुलझाने की क्षमता हो, तो हमें रोल मॉडल की तरह उचित व्यवहार करना होगा. 
उन्हें इसका महत्व समझाना होगा, बताना होगा कि उन्हें किन-किन परिस्थितियों में कैसे व्यवहार करना चाहिए? उन्हें बताना होगा कि यदि वे ठीक ढंग से होमवर्क नहीं करते, टीवी, कंप्यूटर, गेम में समय बर्बाद करते हैं, तो उनसे शिक्षक नाराज रहेंगे. छोटे बच्चे समझाने पर अपनी गलतियों को अवश्य सुधार लेते हैं.
बच्चों के चरित्र निर्माण में पैरेंट्स की भूमिका अहम है. ऐसे में पैरेंट्स को बच्चों के स्वभाव का सूक्ष्तम अध्ययन करना होगा. 4-10 वर्ष की उम्र के बच्चों का मन कोमल होता है. उम्र के इस पड़ाव पर बच्चों का चरित्र निर्माण आजीवन काम आता है. लेकिन बच्चे अलग-अलग परिस्थितियों में अलग तरह से रिएक्ट करते हैं. ऐसे में उनके लिए चरित्र-निर्माण का कार्यक्रम अलग-अलग होना चाहिए.
बच्चों के सामने न झगड़ें
अगर हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे दूसरों को आदर करे, तो हमें रोल मॉडल के रूप में अपने परिवार, दोस्तों, पड़ोसियों, अजनबियों से आदर से व्यवहार करना होगा. पैरेंट्स को अपनी सभी समस्याओं को बेहतर ढंग से सुलझाना होगा. बच्चों के सामने लड़ने-झगड़ने से उनपर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है.
खुले दिल से करें प्रोत्साहित
बच्चे जब गाजिर्यन की अपेक्षाओं को समझ जायें, तो गाजिर्यन को चाहिए कि जब भी बच्चे उनके आशा के अनुरूप अच्छा व्यवहार करें, तो उनको खुले दिल से प्रोत्साहित करें.
चरित्र निर्माण एक दिन का काम नहीं
चरित्र निर्माण का प्रयास एक दिन, एक सप्ताह में पूरा नहीं होता. इसे तो रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल करना होगा.बच्चों को अच्छी-बुरी घटनाओं का उदाहरण देते हुए उन्हें अच्छे-बुरे का अंतर समझाएं.
प्रेरणादायक कहानियां हैं सहायक
बच्चों के चरित्र निर्माण में प्रेरणादायक कहानियां जैसे हितोपदेश की कहानियां, चरित्र निर्माण की कहानियां, पंचतंत्र की कहानियां, परियों, दादा-दादी, नाना-नानी की कहानियां अत्यंत ही सहायक होती हैं. बच्चे भी उन्हीं के करीब होते हैं और बात मानते हैं जो गाजिर्यन उन्हें कहानियां सुनाते हैं. इससे बच्चों में ईमानदारी, परोपकार, सदाचार एवं देशप्रेम की भावनाएं उत्पन्न होती है. बच्चों को विभिन्न परोपकारी सेवाओं जैसे गरीबों को भोजन कराना, घर की सफाई, वृक्षारोपण इत्यादि में लगाने से उनमें सेवा भाव, उदारता, ईमानदारी एवं जिम्मेवारी आती हैं.
एक साथ करें भोजन
पूरे परिवार के सदस्यों के साथ भोजन प्राय: बिना टेलीविजन के साथ में करें, जहां उनसे टेबुल मैनर एवं अन्य संस्कारों के विषय में चर्चा करें.
जिम्मेवारी बांटें
परिवार के सभी छोटे बड़े सदस्यों में जिम्मेवारी बाटें जैसे खाने में टेबुल को साफ करना, अलमारी सजाना इत्यादि. घर में होनेवाले आयोजनों में छोटे बच्चों की जिम्मेवारी निर्धारित करें. अभिभावकों को यह जताना होगा कि वे बच्चों का भरपूर ध्यान रखते हैं. वे उनके अनुशासन, चरित्र निर्माण के प्रति सजग हैं. बच्चों के दोस्तों तथा उनके अभिभावकों से मिलते रहें तथा उन्हें पहचानें. यह जानने का प्रयास करें कि टीवी पर बच्चे कौन-सा धारावाहिक देखना चाहते हैं.
पॉजिटिव कामों में रखें व्यस्त
बच्चों को सकारात्मक क्रियाओं में व्यस्त रखें, जैसे-खेलकूद, संगीत, वाद्ययंत्र सीखना, अन्य हॉबी में अथवा एनसीसी इत्यादि. इनसे बच्चों में सहयोग, मिल-बांटकर रहने, किसी कार्य को सपफलता पूर्वक करने की कला आती है. बच्चे अगर अनुशासनहीनता व गलत हरकत पर कोई चालाकीपूर्ण बहाना बनाते हैं, तो उन्हें कभी बचाने में सहयोग न करें.

ऑफबीट आलेख 

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