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रविवार, 3 मार्च 2013

कट गयी दीवार





 

गर्दे हैरत से अट  गयी दीवार,
आइना देख कट गयी दीवार।
 
लोग  वे मंजरों से डरा करते थे ,
अब के काया पलट गयी दीवार,
 
सर को टकराने हम कहाँ जाएँ,
शहरे बहशत से पट गयी दीवार।
 
इस कदर  टूट का मिला वह शख्स,
मेरे अन्दर की  फट गयी  दीवार।
 
गम  ऐ  वक्त  के  सितम टूटे,
जब मेरे कद से हट गयी दीवार।
 
हम लतीफा सुना के जब लौटे,
कहकहो  से लिपट गयी दीवार।
 
फासलें और बढ़ गयी ऐ राज,
घर से घर की सट गयी दीवार।

दीवार क्या गिरी मेरे खस्ता मकान की,
लोगों  ने मेरे सेहन में रास्ते बना लिये।
                                                                                                                                     (साभार:अज्ञात )

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