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मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

"भाग्य और पुरषार्थ में संतुलन"



नैवाकृति: फलति नैव कुलं न शीलं विद्यापि नैव न च यत्नकृताऽपि सेवा।
भाग्यानि पूर्वतपसा खलु सञ्चितानि काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षा:।।

अर्थ: मनुष्य की सुन्दर आकृति,उतम कुल, शील, विद्या, और खूब अच्छी तरह की हुई सेवा - ये सब कुछ फल नहीं देते किन्तु पूर्वजन्म के कर्म ही समय पर वृक्ष की तरह फल देते हैं।
टिप्पड़ी: हमारे वर्तमान जीवन में हमारे भूतकाल का भी पूरा पूरा प्रभाव और नियंत्रण रहता है क्योकि हमारा जो आज है वह गुजरे कल से ही पैदा होता है और जो आने वाला कल है वह  आज से यानि वर्तमान से पैदा होगा। यह जो कल, आज और कल वाली बात है यह काल गणना के अंतर्गत ही है वरना जो कालातीत स्थिति में है उनके लिए 'न भूतो न भविष्यति' के अनुसार न भूतकाल है न भविष्य काल है। उनके लिए सदा वर्तमान काल ही रहता है। शरीर  तल पर भूत भविष्य होते हैं, आत्मा के तल पर सदैव वर्तमान काल ही रहता है। हमें शरीर के तल पर भूतकाल और भविष्य काल का अनुभव होता है और हम समझते हैं की पूर्व काल की कर्मो के फल हम भोग रहें हैं। दरअसल सारे कर्मो का फल वर्तमान काल में ही फलित हो रहें हैं।  जो इस रहस्य को समझ लेते हैं वें भूत-भविष्य से परे उठकर सदैव वर्तमान में ही जीते हैं और कर्म और कर्मफल के तारतभय को जानते हैं।  कर्म से कर्मफल कभी जुदा नहीं होता क्योकि कर्मफल जिसे हम प्रारब्ध या भाग्य मानते हैं वह कर्म का ही अंतिम चरण होता है।पूर्व जन्मों में या पूर्व समय में हमने जो भी कर्म किये, उन्हीं सब का फल मिलकर तो भाग्य रूप में हमारे सामने आता है। भाग्य हमारे पूर्व कर्म संस्कारों का ही तो नाम है और इनके बारे में एकमात्र सच्चाई यही है कि वह बीत चुके हैं। अब उन्हें बदला नहीं जा सकता। लेकिन अपने वर्तमान कर्म तो हम चुन ही सकते हैं। यह समझना कोई मुश्किल नहीं कि भूत पर वर्तमान हमेशा ही भारी रहेगा क्योंकि भूत तो जैसे का तैसा रहेगा लेकिन वर्तमान को हम अपनी इच्छा और अपनी हिम्मत से अपने अनुसार ढाल सकते हैं।कर्म से भाग्य बनता है या भाग्य से कर्म करते हैं लेकिन दोनों के बीच कोई खास रिश्ता जरूर होता है।
इसी बात को हम एक कहानी के माध्यम से समझते हैं  …… 
एक बार दो राज्यों के बीच युद्ध की तैयारियां चल रही थीं। दोनों के शासक एक प्रसिद्ध संत के भक्त थे। वे अपनी-अपनी विजय का आशीर्वाद मांगने के लिए अलग-अलग समय पर उनके पास पहुंचे। पहले शासक को आशीर्वाद देते हुए संत बोले, 'तुम्हारी विजय निश्चित है।' 

दूसरे शासक को उन्होंने कहा, 'तुम्हारी विजय संदिग्ध है।' दूसरा शासक संत की यह बात सुनकर चला आया किंतु उसने हार नहीं मानी और अपने सेनापति से कहा, 'हमें मेहनत और पुरुषार्थ पर विश्वास करना चाहिए। इसलिए हमें जोर-शोर से तैयारी करनी होगी। दिन-रात एक कर युद्ध की बारीकियां सीखनी होंगी। अपनी जान तक को झोंकने के लिए तैयार रहना होगा।' 

इधर पहले शासक की प्रसन्नता का ठिकाना न था। उसने अपनी विजय निश्चित जान अपना सारा ध्यान आमोद-प्रमोद व नृत्य-संगीत में लगा दिया। उसके सैनिक भी रंगरेलियां मनाने में लग गए। निश्चित दिन युद्ध आरंभ हो गया। जिस शासक को विजय का आशीर्वाद था, उसे कोई चिंता ही न थी। उसके सैनिकों ने भी युद्ध का अभ्यास नहीं किया था। दूसरी ओर जिस शासक की विजय संदिग्ध बताई गई थी, उसने व उसके सैनिकों ने दिन-रात एक कर युद्ध की अनेक बारीकियां जान ली थीं। उन्होंने युद्ध में इन्हीं बारीकियों का प्रयोग किया और कुछ ही देर बाद पहले शासक की सेना को परास्त कर दिया। 

अपनी हार पर पहला शासक बौखला गया और संत के पास जाकर बोला, 'महाराज, आपकी वाणी में कोई दम नहीं है। आप गलत भविष्यवाणी करते हैं।' उसकी बात सुनकर संत मुस्कराते हुए बोले, 'पुत्र, इतना बौखलाने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हारी विजय निश्चित थी किंतु उसके लिए मेहनत और पुरुषार्थ भी तो जरूरी था। भाग्य भी हमेशा कर्मरत और पुरुषार्थी मनुष्यों का साथ देता है और उसने दिया भी है तभी तो वह शासक जीत गया जिसकी पराजय निश्चित थी।' संत की बात सुनकर पराजित शासक लज्जित हो गया और संत से क्षमा मांगकर वापस चला आया। 

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