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रविवार, 1 सितंबर 2013

मानव की शक्ति




मानव में गर शक्ति होती 
प्रार्थना की उत्पति न होती 
मानव में गर भक्ति होती 
प्रार्थना की संतति  न होती। 
मानव में गर विरक्ति होती 
लोभ-वृति कतई न होती 
शक्ति,भक्ति,विरक्ति,
प्रार्थना की देन है बन्धु !
कहता है सत-चित-ज्ञान सिन्धु 
विन्दु में झरे बिन सिन्धु 
सुज्ञान की वर्षा  न होती 
जहाँ पर मति सोती 
वहाँ कलह होती।  
घर,गावँ,शहर में होती 
प्रदेश और देश में होती 
मानव में गर शक्ति होती 
दानव की उत्पति न होती। 
प्रार्थना में है शक्ति 
शक्ति में है भक्ति 
भक्ति में है विरक्ति 
विरक्ति में है जीवन 
जीवन ग्रहण कीजिये 
मरना को मुक्ति दीजिये 
इसी में है बहु-जन हित 
इसी में है देश हित। 

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