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सोमवार, 14 अगस्त 2017

स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें




आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें। 

आज तिरंगा फहराता है अपनी पूरी शान से।
हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।

आज़ादी के लिए हमारी लंबी चली लड़ाई थी।
लाखों लोगों ने प्राणों से कीमत बड़ी चुकाई थी।।

व्यापारी बनकर आए और छल से हम पर राज किया।
हमको आपस में लड़वाने की नीति अपनाई थी।।

हमने अपना गौरव पाया, अपने स्वाभिमान से।
हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।

गांधी, तिलक, सुभाष, जवाहर का प्यारा यह देश है।
जियो और जीने दो का सबको देता संदेश है।।

प्रहरी बनकर खड़ा हिमालय जिसके उत्तर द्वार पर।
हिंद महासागर दक्षिण में इसके लिए विशेष है।।

लगी गूँजने दसों दिशाएँ वीरों के यशगान से।
हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।

हमें हमारी मातृभूमि से इतना मिला दुलार है।
उसके आँचल की छैयाँ से छोटा ये संसार है।।

हम न कभी हिंसा के आगे अपना शीश झुकाएँगे।
सच पूछो तो पूरा विश्व हमारा ही परिवार है।।

विश्वशांति की चली हवाएँ अपने हिंदुस्तान से।
हमें मिली आज़ादी वीर शहीदों के बलिदान से।।


धन्यवाद-
सजीवन मयंक

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

निराशा-गज़ल


आ समन्दर के किनारे पथिक प्यासा रह गया,
था गरल से जल भरा होकर रुआंसा रह गया।
                    था सफर बाकि बहुत मजिल अभी भी दूर  थी,
                    हो गया बढना कठिन घिर कर कुहासा रह गया।
लग रहे नारे हजारो छप रही रोज लाखो खबर,
गौर से जब  देखा तो बन तमाशा रह  गया।
                    एक बुत गढ ने लगी  अनजान  में ही  मगर,
                    हादसा ऐसा हुआ की वह बिन तराशा रह गया।
छोड़ कर  आशा किसी का चल पड़ा बेचारा"राज",
आज  बादा लोगो का  बस  दिलासा  रह   गया।

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

मशवरा-गज़ल

घर से निकलोगी तो सोचा है किधर जाओगी,
हर तरफ तेज हवा है टूट कर बिखर जाओगी।
               इतना आंसा नही लफ्जो पर  भरोसा  करना,
               जब घर की दहलीज पुकारेगी किधर जाओगी।
शाम होते ही सिमट  जायेगे  सारे  तेरे रास्ते,
बहते दरिया से जहाँ होगे  वही ठहर जाओगी।
               हर नये जगह में कुछ यादें कडवी होती हैं,
               छत से दीवारें जुदा होगी तो डर जाओगी।
पहले हर चीज नजर आयेगी बेमानी सी,
फिर  अपने   ही  नजरो से  उतर  जोगी।
              "राज" के नेक मशवरे  पर अमल  करना,
               रास्ते के बिकट भवँर  से निकल  जाओगी।



सोमवार, 3 दिसंबर 2012

सदाए कैद करूं-गज़ल


सदाए कैद करूं  या आहटे  चुरा  ले जाउ,
महकते जिस्म की खुशबुए चुरा ले जाऊ।
                                तेरी अमानते महफूज रख न पाउँगा,
                                दुबारा लौट के आने का वादा न कर पाउँगा।
बला के शोर है तूफ़ान आ गया शायद,
कहाँ  का वक्त ऐ सफर खुद को ही बचा ले जाऊ।
                                कहना  है दरिया का  यह शर्त हार जायेगा,
                                जो एक दिन में उसे साथ बहा ले जाऊ।
अभी और न जाने कहाँ कहाँ भटकु,
कभी बहाया था दरिया में जो दिया ले जाऊ।



रविवार, 2 दिसंबर 2012

जीने की अरमान-गज़ल

                   
सांसे तो है मगर अब जीने की अरमान नही है,
देखा है जिन्दगी को इस कदर खुद की पहचान नही है।
                 दर्द है बिखरा है जहाँ में यहाँ से वहाँ  तलक,
                 बाँट ले गम थोडा सा ही ऐसा कोई इन्सान नहीं है  ।
खेल कर जी भर आग से कहने लगे है अब तो,
जलते तन मन के लिए बर्फ का सामान नही है।
                 गुल-ए-चमन में जग कर रात रात भर,
                 मायूस हो कहते है वो काँटों का बरदान नही है।
बुझेगी नही प्यास सुरा से,सुन्दरी से औ शबाब से,
जवानी तो दो घडी है हरदम तो इसका एलान नही है ।
                  लुट कर खुद गैर की आबरू दिन दहाड़े ही,
                  कहते है वो आदमी की शक्ल में भगवान नही है।
गवां दी उम्र सारी  मनमानी हरकतों के तहत।
थक गये तो कहते है सर पर आसमान नहीं है।
                  सभल जा अब भी थोडा वक्त है "राज",
                  जिन्दगी की राहों  को समझना आसन नही है।

जिस बात का डर था-गज़ल

जिस बात का डर था सोचा कल होगी,
जरखेज जमीनों में बिभार फसल होगी।

तफसील में जाने से ऐसा तो नही लगा,
हालात के नक्शों में अब फेरबदल होगो।

स्याही से इरादों की तस्वीर बनाते हो ,
गर ख़ूँ से तस्वीर बनाओ तो असल होगी।

लफ्जो से निपट सकती तो कब की पट जाती,
पेचीदा पहेली है बातो से न हल होगी।

इन अंधक सुरंगों में बैठे है तो लगता है,
बाहर भी अन्धेरे की बदशक्ल नकल होगी।

जो वज्म में आये थे बोल नही सके,
उन लोगो की हाथो में "राज" की गजल होगी।

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

इंसानी चेहरे के पीछे- गज़ल



इंसानी    चेहरे के  पीछे  खूनी   मंजर  देखे  है,

और प्यार के उम्मीदों पर पड़ते पत्थर देखे है।


लहरों के पीछे हो जाना मुशिकल शायद नहीं रहा,
अपनी बस्ती में लोगो   के खौफ़जदा घर देखे  है।


जिसको हमने साथ किया था तन्हाई में चलने को,
न  वक्त में  उनके हाथ  में हमने  खंजर देखे है।


मंजिलो से कदमो को रिश्ता कितना मुश्किल है,
बरसातों में  कच्चे घर  के चुते  छप्पर  देखे   है।


अब तो चलना भी डर लगता है किसको हाथ साथ करे,
ऐ "राज"राह  बदल कर चलने वाले कितने रहवर देखे है।




शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

गम के आँसू-गज़ल

शायद वो आती  थी अब आना भूल गयी,
न जाने क्यू  वो साहिल अपना भूल गई।
                        रास्ता बदल गया वो दूर निकल गई।
                        माना  भूल गयी शायद अपना सपना भूल गई।
इस राह पर मै क्या रहकर  किये जा  हूँ,
कि खुद इस जख्म पर गुमराह किये जा रहा हूँ।
                        जिन्दगी के कुछ स्वप्न बना रखे थे हमने यहाँ,
                        पर "राज" खुद ही खुद को बेकरार किये जा रहा हूँ।
सोच सोच कर खुद जल रहा हूँ मैं यहाँ,
कि ख़ुशी के बदले गम के आँसू  बहा रहा हूँ।



गुरुवार, 29 नवंबर 2012

पिछले पहर-गज़ल

Rat ke pichhle pahar hmko sada deta hai kaun,
drde dil ke rog ki hashr ko dba deta hai kaun.

raat ke pichhale pahar hamako sada deta hai kaun,
darde dil ke rog kee hsr ko daba deta hai kaun

pahale to jalava dikha kar chhinakar hosho havaas,
 reshamee aanchal se phir hava deta hai kaun.

jis jamee mein ho chuke baaraha pevast ham, 
phir isee mittee se ye hamako bana deta hai kaun.

ham talaashe aadamiyat sabase bekhabar,
man ke mandir mein magar hamako saja deta hai kaun.

ham "raaj" ke dil mein arama rakhate hai sabase chhupae, 
dil mein aakar chupake se unako mita deta hai kaun.


मुनव्वर खान

बतलाता रहा-गज़ल

"बाज" जाने किस तरह हमसे यह बतलाता रहा,

क्यों परिंदों के दिलो से उसका डर जाता रहा।

मैंने जब आवाज को दफन कर दिया तब क्यों,
मुझे बाहर से____ महफिल में बुलवाता रहा।

आज गलियों में सदाए देता देता मर गया,
जो जिन्दगी भर गला औरो का दबवाता रहा।

बिना पत्ता का लिफाफा आग मुझमे है भरी,
लिखने वाला बंद कर कही भिजवाता रहा।

आया था तो मुस्कराए अब गया तो रोएं क्यों,
अपना उसका पेड़ पत्ती का सदा नाता रहा।

मैंने अम्बर को पिरो कर एक माला भी बना ली,
सामने आया तो कोई जब तब मै शर्माता रहा।

                                          
  अज्ञात 

बुधवार, 28 नवंबर 2012

जिन्दगी मयखाना है-गज़ल



जिन्दगी मयखाना है मदहोश होकर  जीना है,
कुरुक्षेत्र में आना है तो कुछ तो जरुर  खोना है।

जीवन एक संघर्ष है तो लड़कर ही कुछ पाना है,
तदिर का खेल है सुख-दुःख को आना जाना है।

कुछ लोग कायर है हर कदम पर गम को पीना है,
बाजुओं में दम है फिर भी ये करनी को रोना  है।

जीवन का सत्य है _______जहर को  खाना  है,
सुख वही है लूटो जो दूसरों के नसीब का दाना है।

चिता की अग्नि से लौटकर ख़ुशीके गीत गाना है,
अंतिम अरमान यही है चैन की नींद   सोना है।

चक्र यूं ही चलता रहता है "राज" बीज बोना है,
जिन्दगी मयखाना है _मदहोश होकर जीना है।



                                                           "धन्यबाद"

गम दिखाने वाले-गज़ल

    हम हँसते है तो दुनियाँ  समझती है की हमे गम नहीं,
    वैसे भी  दुनिया में  गम  दिखाने  वाले कम   नहीं।

   गम  दिखाना भी लोगो ने बना लिया है एक  कम,
   उन्हें क्या मालूम गम में डूबी है मेरी सुबह--शाम।

   हम उन लोगो में से नहीं कि अपना गम दिखाते रहें,
   हम तो दुसरो के गम उठाए  बाटते.............  फिरे।

   दुनिया ने हर वक्त ऐसे लोगो को गलत ही समझा,
   अब  भी  कहते  रहना खुद की    बदौलत  समझा।

   हम दुनियां का कहना क्यों सोचे"राज"उनका गम नही,
   क्योकि गम है  पर  गम  दिखाने   वालो में  से हम नहीं।




                                                           "धन्यबाद"

सोमवार, 26 नवंबर 2012

राजनीति की नालियाँ-गज़ल


उठाते हैं  तूफा  यहाँ  पर  प्यालियों  में    लोग,
जिनमे खाते छेद करते उन्ही थालियों में लोग।
                   पी -पी कर  सत्ता   की  मदिरा  बेहिसाब,
                   लुढ़क गए राजनीति की नालियों में लोग।
हर्ष के उन्माद में जलाकर किसी का  घर,
खो गये अपनी अपनी दीवालियों में लोग। 
                   चुटकी भर खुशहाली पाने की उम्मीद में,
                   जी  रहे  बरसो  से  बदहालियों   में लोग।
चमन में चुन चुन के जो नोचते है कलियाँ,
उन को भी गिन रहे  है  मालियों  में लोग।
                    नपुंसक भीड़ जुटा  करके अपने आस पास,
                    खुश हो रहे खरीदी हुई  तालियों  में  लोग।
या  जोड़ने में  लोग  खर्च कर देते जिन्दगी,
या बिताते है जिन्दगी रखवालियों में लोग।
                    उजाले में जो बाँटते गरीबो  में अन्न बस्त्र,
                    अँधेरे में शामिल वही मवालियो में  लोग।
कालिख को साफ करने के जरिये बहुत है "राज",
सो लगे है कोयले की दलाली में _______लोग।

गम में डूबे लोग-गज़ल

 
गम में डूबे से बेवाक नजर आने लगे है  लोग,
अपने में खोए अंजान नजर आने लगे है लोग।
          आज हर लम्हा बिखरने लगा ख्वाबो की तरह,
          क्यों बदलने लगे अपने लोग भी गैरो की तरह।
सच की निगाहों से कतराने लगे है लोग,
गम में डुबे से बेवाक नजर आने लगे है लोग।
          रुख यू बदलने लगे हर शख्स हवाओ की तरह,
            फरेब करने  लगा हर शख्स हवाओ की तरह।
घर बार छोड़ चौराहे पर आने लगे है लोग,
गम में डूबे बेवाक नजर आने लगे है लोग।
            जिन्दगी गुजरने  लगी दिन  की बुँदे  बनकर,
             आदमी सवरने लगा  अपने  में ही खो    कर।
अपने ही आप क्यों बहकने लगे है सारे लोग,
गम में डूबे बेवाक नजर आने  लगे हैं  लोग।
             इन्सान क्यों बनने लगा   मशीनों  की तरह,
             रंग में धूमिल हुए आज ये रिश्ते भी तमाम।
जिन्दगी इस तरह क्यों बोझ बनाने "राज",
गम में डुबे बेवाक नजर आने लगे हैं लोग।

रविवार, 25 नवंबर 2012

बेबस यों बेकरार-गज़ल


ऐसे बेबस यों बेकरार है हम, 
जिन्दगी तेरे गुनाहगार ही हम।


जो भी आया किनारा कर गया,
 और किनारों से दरकिनार है हम।


दिन जो गुजरे वो कदर याद आये, 
अपने अतीत की ही मजार है हम।

गुजरी हर   हद से उनकी बेदर्दी,
 अब  तो  बेचैन  औ  जार-जार है  हम।

इतनी बेमानी है जिन्दगी ऐ"राज",
अक्स पर  ही अपने  शर्मसार है  हम




शनिवार, 24 नवंबर 2012

Ghazal-Life (जिन्दगी)

kuchh ham bhi khil gye hain tumhari kitab main,
ganga ke jal ko dhal n dena shrab main.

ham se to jindgi ki kahani n ban saki,
sade hi rah gye sabhi panne kitab main.

duniyan ne kiya tha kabhi chhota sa aek swal,
hamne jindgi hi luta di aapke jabab main.

lete n muhn fer hamari taraf se aap,
kuchh khubiyan bhi dekhate khankharab main 

kuchh bat hai ki aapko aaya hai aaj pyar,
dekha nhin tha jwar yon moti ke aab men 





साभार:गुलाब खंडेलवाल 




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