Ghazal लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Ghazal लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 28 नवंबर 2015

जनता का हक़-ग़ज़ल


जनता का हक़ मिले कहाँ से, चारों ओर ‪दलाली है |
‪चमड़े का दरवाज़ा है और ‪कुत्तों की रखवाली है ||

‪मंत्री, नेता, अफसर, मुंसिफ़ सब जनता के सेवक हैं |
ये जुमला भी प्रजातंत्र के मुख पर ‪भद्दी गाली है ||

उसके हाथों की ‪कठपुतली हैं सत्ता के ‪शीर्षपुरुष |
कौन कहे संसद में बैठा ‪गुंडा और मवाली है ||

सत्ता ‪बेलगाम है जनता ‪गूँगी बहरी लगती है |
कोई उज़्र न करने वाला कोई नहीं ‪सवाली है ||

सच को यूँ ‪मजबूर किया है देखो झूठ बयानी पर |
‪माला फूल गले में लटके पीछे सटी ‪दोनाली है ||

‪दौलत शोहरत बँगला गाड़ी के पीछे सब भाग रहे हैं |
‪फसल जिस्म की हरी भरी है ‪ज़हनी रक़बा खाली है ||

‪सच्चाई का जुनूँ उतरते ही हम ‪मालामाल हुए |
हर सूँ यही हवा है ‪रिश्वत हर ताली ताली है ||

वो ‪सावन के अंधे हैं उनसे मत पूँछो रुत का हाल |
उनकी खातिर हवा ‪रसीली चारों सूँ ‪हरियाली है ||

‪पंचशील के नियमो में हम खोज रहे हैं सुख साधन |
चारों ओर ‪महाभारत है दाँव चढ़ी ‪पञ्चाली है ||

पहले भी ‪मुगलों-अंग्रेजो ने जनता का ‪‎खून पिया |
आज 'विप्लवी' भेष बदलकर नाच रही खुशहाली है ||

साभार :- बी. आर. विप्लवी

बुधवार, 6 मार्च 2013

खफा-ए-जिन्दगी



 

 
खफा-ए -जिन्दगी  को भुला कर के  तो देखिए ,
ख्वाबो की दुनियाँ से निकल कर के तो देखिए ।
 
तेरी यादों के  ही  सहारे जी  रहें हैं  अब तलक,
दिल के झरोंखे में कोई दीप जला कर के देखिए। 
 
हम समझ न पाए अब तक आपकी रुसवाई को,
नस्तरे दिल से अपना इल्जाम हटा के तो देखिए।
 
दस्ताने-ए-दिल को मेरी जुबां से  सुना ही नही,
तिलिस्मे बेहिसी को कभी तोड़  के तो देखिए।
 
दर्दे-दिल को सहते हुए कितने सदियाँ गुजर गयी,
अपने माजी के मजार पर कभी आ कर के देखिए।
 
लगता अब उतर जायेंगे लहद में अहबाब के कांधों से,
रब के दर पर मेरे गुनाहों की सजा सुना कर तो देखिये। 
 
 
अर्थ:  तिलिस्मे =भवंर जाल, माजी=अतीत, मजार =कब्र, लहद=कब्र, अहबाब=मित्र जन 
 
 
चलते चलते प्रस्तुत है:
                                करोगे याद गुजरे हसीन यादों को,
                                         तरसोगे हमारे साथ एक पल बिताने को।
                                                         फिर आवाज दोगे हमें बुलाने को,
                                                                 नहीं दरवाजा होगा स्वर्ग से वापस आने का।।


मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

मशवरा-गज़ल

घर से निकलोगी तो सोचा है किधर जाओगी,
हर तरफ तेज हवा है टूट कर बिखर जाओगी।
               इतना आंसा नही लफ्जो पर  भरोसा  करना,
               जब घर की दहलीज पुकारेगी किधर जाओगी।
शाम होते ही सिमट  जायेगे  सारे  तेरे रास्ते,
बहते दरिया से जहाँ होगे  वही ठहर जाओगी।
               हर नये जगह में कुछ यादें कडवी होती हैं,
               छत से दीवारें जुदा होगी तो डर जाओगी।
पहले हर चीज नजर आयेगी बेमानी सी,
फिर  अपने   ही  नजरो से  उतर  जोगी।
              "राज" के नेक मशवरे  पर अमल  करना,
               रास्ते के बिकट भवँर  से निकल  जाओगी।



सोमवार, 26 नवंबर 2012

गम में डूबे लोग-गज़ल

 
गम में डूबे से बेवाक नजर आने लगे है  लोग,
अपने में खोए अंजान नजर आने लगे है लोग।
          आज हर लम्हा बिखरने लगा ख्वाबो की तरह,
          क्यों बदलने लगे अपने लोग भी गैरो की तरह।
सच की निगाहों से कतराने लगे है लोग,
गम में डुबे से बेवाक नजर आने लगे है लोग।
          रुख यू बदलने लगे हर शख्स हवाओ की तरह,
            फरेब करने  लगा हर शख्स हवाओ की तरह।
घर बार छोड़ चौराहे पर आने लगे है लोग,
गम में डूबे बेवाक नजर आने लगे है लोग।
            जिन्दगी गुजरने  लगी दिन  की बुँदे  बनकर,
             आदमी सवरने लगा  अपने  में ही खो    कर।
अपने ही आप क्यों बहकने लगे है सारे लोग,
गम में डूबे बेवाक नजर आने  लगे हैं  लोग।
             इन्सान क्यों बनने लगा   मशीनों  की तरह,
             रंग में धूमिल हुए आज ये रिश्ते भी तमाम।
जिन्दगी इस तरह क्यों बोझ बनाने "राज",
गम में डुबे बेवाक नजर आने लगे हैं लोग।

रविवार, 25 नवंबर 2012

पहले कभी (Pahle kabi) -गज़ल

Jis tarh dekha hai ab phle kabhi dekha n tha,
Itani sidhat se use maine kabhi chaha nhi tha.

Dekhte hin dekhte najron se oojhl ho chali,
Abhi to ji bhr ke maine use dekha bhi n tha.

Janta tha ki yah honi hai judai aek din,
Vah achank bichhud jayegi yah socha n tha.

Pahle pane ki khushi thi ab khone ka hai gam,
Khavabonki duniya main gam dil dhadka n tha.

Dard un aankhon ka jo takte huae pathra gayi,
Matam un aansun ka jo nyno se dhlka n tha.

Aaene se khwab mere reja-reja ho gye,
Main tilsmi bandison ko todkr nikla n tha.

Kya tere bite huae anmol chhn nind ke spne ho gye,
Main to moti tha tere dil ka koai tinka n tha.

Silsila dr-silsila hai sb shrabe jindgi,
Jahr chakhne ka yah "Raj" ka tajurba phla n tha.
"Anwar mahmud khalid"



शनिवार, 24 नवंबर 2012

Ghazal-Life (जिन्दगी)

kuchh ham bhi khil gye hain tumhari kitab main,
ganga ke jal ko dhal n dena shrab main.

ham se to jindgi ki kahani n ban saki,
sade hi rah gye sabhi panne kitab main.

duniyan ne kiya tha kabhi chhota sa aek swal,
hamne jindgi hi luta di aapke jabab main.

lete n muhn fer hamari taraf se aap,
kuchh khubiyan bhi dekhate khankharab main 

kuchh bat hai ki aapko aaya hai aaj pyar,
dekha nhin tha jwar yon moti ke aab men 





साभार:गुलाब खंडेलवाल 




You might also like :

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...