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गुरुवार, 14 अगस्त 2014

"स्वतंत्रता दिवस"



प्रिये मित्रों, आज हम सबका स्वतंत्रता दिवस है, स्‍वतंत्रता दिवस ऐसा दिन है जब हम अपने महान राष्‍ट्रीय नेताओं और स्‍वतंत्रता सेनानियों को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं जिन्‍होंने विदेशी नियंत्रण से भारत को आज़ाद कराने के लिए अनेक बलिदान दिए और अपने जीवन न्‍यौछावर कर दिए। 15 अगस्त 1947 को भारत के निवासियों ने लाखों कुर्बानियां देकर ब्रिटिश शासन से स्वतन्त्रता प्राप्त की थी। इस वर्ष हम आजादी की 68वीं वर्ष गांठ मना रहे हैं। आज हम अपने महान राष्ट्रीय नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों को अपनी श्रद्धांजलि देते हैं - जिन्होंने विदेशी नियंत्रण से भारत को आजाद कराने के लिए अनेक बलिदान दिए और अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।भारत को आजादी दिलाने के लिये शहीद हुए सभी शहीदों और इस आजादी को बरकरार रखने के लिये अपने प्राण गवांने वाले सेना के सभी जवानों को हमारी भावपूर्ण श्रद्धांजलि।
जिनकी लाशों पर पग धर कर आजादी भारत में आई। 
वे अब तक हैं खानाबदोश ग़म की काली बदली छाई॥ 

कलकत्ते के फुटपाथों पर जो आंधी-पानी सहते हैं। 
उनसे पूछो, पन्द्रह अगस्त के बारे में क्या कहते हैं॥ 

हिन्दू के नाते उनका दुख सुनते यदि तुम्हें लाज आती। 
तो सीमा के उस पार चलो सभ्यता जहाँ कुचली जाती॥ 

इंसान जहाँ बेचा जाता, ईमान ख़रीदा जाता है। 
इस्लाम सिसकियाँ भरता है,डालर मन में मुस्काता है॥ 

भूखों को गोली नंगों को हथियार पिन्हाए जाते हैं। 
सूखे कण्ठों से जेहादी नारे लगवाए जाते हैं॥ 

लाहौर, कराची, ढाका पर मातम की है काली छाया। 
पख़्तूनों पर, गिलगित पर है ग़मगीन ग़ुलामी का साया॥ 

बस इसीलिए तो कहता हूँ आज़ादी अभी अधूरी है। 
कैसे उल्लास मनाऊँ मैं? थोड़े दिन की मजबूरी है॥ 

दिन दूर नहीं खंडित भारत को पुनः अखंड बनाएँगे। 
गिलगित से गारो पर्वत तक आजादी पर्व मनाएँगे॥ 

उस स्वर्ण दिवस के लिए आज से कमर कसें बलिदान करें। 
जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें॥
साभार-अटल बिहारी वाजपेयी जी


बुधवार, 14 अगस्त 2013

देशभक्तों नमन




जाँ पे खेला बचाया है तुमने वतन

ज़ुल्म सहते रहे गोली खाते रहे
बीच लाशों के तुम मुस्कुराते रहे
कतरे-कतरे से तुमने ये सींचा चमन
आज करता हूँ मैं देशभक्तों नमन

साँप बनकर जो आए थे डसने हमें
कुचला पैरों से तुमने मिटाया उन्हें
कर दिया पल में ही दुश्मनों का दमन
आज करता हूँ मैं देशभक्तों नमन

सर झुकाया नहीं सर कटाते रहे
देख बलिदान दुश्मन भी जाते रहे
माँ ने बाँधा था सर पे तुम्हारे कफ़न
आज करता हूँ मैं देशभक्तों नमन











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बोलने का जोश रखते हैं
                           
खामोश रखते हैं
                                            अपने अपने अर्थों का हम
                                                                        एक शब्दकोश रखते हैं


आभार: महेश मूलचंदानी

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