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गुरुवार, 6 मार्च 2014

"निराशा"

आ समन्दर के किनारे पथिक प्यासा रह गया,
था गरल से जल भरा होकर रुआंसा रह गया।

था सफर बाकि बहुत मजिल अभी भी दूर थी,
हो गया बढना कठिन घिर कर कुहासा रह गया।

लग रहे नारे हजारो छप रही रोज लाखो खबर,
गौर से जब देखा तो बन तमाशा रह गया।

एक बुत गढ ने लगी अनजान में ही मगर,
हादसा ऐसा हुआ की वह बिन तराशा रह गया।

छोड़ कर आशा किसी का चल पड़ा बेचारा"राज",
आज वादा  लोगो का बस दिलासा रह गया।


शनिवार, 6 जुलाई 2013

दिल का दर्द



दिल का दर्द ज़बाँ पे लाना मुश्किल है
अपनों पे इल्ज़ाम लगाना मुश्किल है

बार-बार जो ठोकर खाकर हँसता है
उस पागल को अब समझाना मुश्किल है

दुनिया से तो झूठ बोल कर बच जाएँ,
लेकिन ख़ुद से ख़ुद को बचाना मुश्किल है।

पत्थर चाहे ताज़महल की सूरत हो,
पत्थर से तो सर टकराना मुश्किल है।

जिन अपनों का दुश्मन से समझौता है,
उन अपनों से घर को बचाना मुश्किल है।

जिसने अपनी रूह का सौदा कर डाला,
सिर उसका ‘राज ’ उठाना मुश्किल है।
****************************
चलते चलते,
मुश्किल चाहे लाख हो लेकिन इक दिन तो हल होती है,
ज़िन्दा  लोगों की  दुनिया में  अक्सर  हलचल  होती है।
                                                                                     आभर :अजीज आजाद 

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

आने का शुक्रिया



चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया
पत्थर को बुत की शक्ल में लाने का शुक्रिया 
        
जागा रहा तो मैंने नए काम कर लिए
ऐ नींद आज तेरे न आने का शुक्रिया


सूखा पुराना जख्म नए को जगह मिली
स्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया 
        
आती न तुम तो क्यों मैं बनाता ये सीढ़ियाँ
दीवारों, मेरी राह में आने का शुक्रिया


आँसू-सा माँ की गोद में आकर सिमट गया
नजरों से अपनी मुझको गिराने का शुक्रिया 
        
अब यह हुआ कि दुनिया ही लगती है मुझको घर
यूँ मेरे घर में आग लगाने का शुक्रिया
                                           

गम मिलते हैं तो और निखरती है शायरी
यह बात है तो सारे जमाने का शुक्रिया
चलते चलते...    
  

बोलो फिर कैसे कटे, यह जीवन की रात
सुना रहा है हर कोई, बस मुर्दों की बात.
आभार-कुँअर बेचैन



"आप सब को नव सवंत्सर २०७० की हार्दिक मंगलकामनायें"

शुक्रवार, 29 मार्च 2013

खुबसूरत लम्हा






 

खुबसूरत कोई लम्हा नही मिलने वाला,
एक हँसता हुआ चेहरा नही मिलने वाला।
 
तेरे हसीन चेहरे को नींद में भी नहीं भूलता,
यूं ही रेतो पर चलने से नही मिलने वाला.
 
तब मेरे दर्द को महसूस करेगें लेकिन,
मेरी खातिर मसीहा तो नही मिलने वाला।
 
वे वजह अपनी निगाहों को परेशा मत करो,
वक्त के भीड में अपना नही मिलने वाला।
 
जाने क्या रंग बदल ले वो सितमगर अपना,
अब किसी से कहीं तन्हा नही मिलने वाला।
 
ऐ "राज"तुमने चिरागों को बुझाया क्योंकर,
इन अँधेरे में तो साया नही मिलने वाला।



बुधवार, 20 मार्च 2013

"घर के दरमियाँ"






कितनी दीवारें उठी हैं एक घर के दरमियाँ
घर कहीं गुम हो गया दीवारो-दर के दरमियाँ.

कौन अब इस शहर में किसकी ख़बरगीरी करे
हर कोई गुम इक हुजूमे-बेख़बर के दरमियाँ.

जगमगाएगा मेरी पहचान बनकर मुद्दतों
एक लम्हा अनगिनत शामो-सहर के दरमियाँ.

एक साअत थी कि सदियों तक सफ़र करती रही
कुछ ज़माने थे कि गुज़रे लम्हे भर के दरमियाँ.

वार वो करते रहेंगे, ज़ख़्म हम खाते रहें
है यही रिश्ता पुराना संगो-सर के दरमियाँ.

किसकी आहट पर अंधेरों के क़दम बढ़ते गए
रहनुमा था कौन इस अंधे सफ़र के दरमियाँ.

बस्तियाँ 'मखमूर' यूँ उजड़ी कि सहरा हो गईं
फ़ासले बढ़ने लगे जब घर से घर के दरमियाँ
.
 
 
 "कहीं पे गम तो कहीं पर खुशी अधूरी है मुझे मिली है जो दुनिया बडी अधूरी है"-शायर मखमूर सईदी जी भावभीनी श्रधान्जली के साथ उनकी रचना.

मंगलवार, 15 जनवरी 2013

हकीकत




        मेरे दिल के समन्दर में कभी उतर कर देखा होता,
        कभी  प्यार के  दो  बोल  बोलकर ही देखा.....होता.
                                 मेरी वफाओं को मेरी नजर से देखा ही नही,
                                 तुम कभी मुझ से दूर जाकर ही सोचा होता.
        इश्क व मोहब्बत का सागर है ...अथाह,
        कभी तुम इसमें उतर क़र ही देखा होता.
                                 प्यार का मतलब जानने से कुछ पहले,
                                 मेरे साथ दो कदम चल के ही देखा होता.
        मेरे गम को अब तुम क्या महसूस  करोगे,
        मेरे दिल की बगिया में आ क़र ही देखा होता.
                                क्या पता था हम सिर्फ मजाक ही है उनके लिए,
                                मीठी जुबा से हकीकत ही बयाँ क़र दिया.. होता.

           

                                           

शनिवार, 12 जनवरी 2013

सपने प्यार के


आँखों में शोले लिए मैं कहाँ से कहाँ आ निकला,
जो घर जला कर आया वह तो  अपना निकला।
             लोगो ने पागल करार दिया फेके पत्थर मुझपर,
             जब मैं लोगो के घर के बराबर से .......  निकला ,
जहाँ  था फूलों उपवन परिंदे  करते थे गुलजार,
वहीं मौत की वीरानियाँ  लिए श्मशान निकला।
             जिन आँखों में दिखता था कभी सपने प्यार के,
             उन्ही पलको में आँसू ....  का समन्दर निकला।
जिन हाथो के पकड़ सोचा कर लेगे दुनियाँ फतह,
पीछे मुडकर देखा उन्ही  हाथो में खंजर निकला।
             साथ क्यों छोड़ जाते है कुछ कदम चलने के बाद,
             संजोये ... ख्वाब टूट गये जब सामने से निकला।
तुम अगर कभी समझ पाओ तो मुझे भी समझाना,
देवो का नकाब लगाये कातिलो का लश्कर निकला।


बुधवार, 2 जनवरी 2013

बेनकाब चेहरे



चहरे बेनकाब  हो गए पहचान की जरुरत नहीं,

आदमी बेईमान हो गए नमन की जरुरत नहीं।


अपने ही  नाखुनो   से नोच डाला चेहरा अपना,
चेहरे  पर औरो   के नाखुनो  की जरुरत  नहीं।

खुद  के बोए   काँटे  जब चुभने ....लगे हो  तब ,
उठती टीसों को किसी क्रंदन की जरुरत  नहीं।

तत्पर है लूटने के लिए आदमी आदमी को यहाँ,
घरो  में अब  किसी दरवान    की जरुरत  नहीं।

टूटती सांसो की डोरी से लटक  रही है जिन्दगी,
"राज"  को किसी  स्पंदन  की  जरुरत   नहीं।








बुधवार, 26 दिसंबर 2012

पत्थर से इन्सान



सोचा था कि अब चला गया हवाओं की  तरह,
गम दुसरे दिन फिर आ गया दीवानों की तरह।

पत्थर से इन्सान  के रिश्ते होते है बड़े अजीब ,
ठोकर किसी ने मारी कोई जल चढ़ा कर गया।

आया तो ऐसा आया नदियों में सैलाबों की तरह,
गया तो ऐसा गया जंगल की दनावल  की तरह।

सोचा था आएगा बिखरे चमन को बसाने के लिए,
पर आया भी तो लहरों  से झोपडी उड़ाने  के लिए।

सोचा की कट  जाएगी जिन्दगी भवरों की तरह,
गम दुसरे दिन फिर आ गया दीवानों  की तरह।






सोमवार, 10 दिसंबर 2012

दिवाली की रौशनी


फिर दिवाली ला रही है रौशनी ,
मुश्किले बिखरा रही है रौशनी।
                 कहकहे थोड़े ब्यथाएँ अनतुली,
                 इस कदर  तरसा रही है रौशनी।
पथ प्रदर्शन की प्रथा को तोडकर,
और भी भटका रही है---रौशनी।
                 रश्मियों का दान लेकर सूर्य से,
                 चांदनी  कहला  रही है  रौशनी।
चाहते है जो कैद करना सूर्य को,
उन्ही को मसला रही है रौशनी।
                सूर्य,दीपक और जुगनु है गवाह,
                रौशनी  को  खा रही है- रौशनी।
दोस्तों तुम से शिकायत क्या करें,
जब हमे  फरमा  रही है--- रौशनी।
              "राज" कालगति किरणों को समझ ले,
               अन्यथा ज्वाला बन कर आ रही है रौशनी।

रविवार, 9 दिसंबर 2012

सिक्के के दो पहलू


हर ख़ुशी की आँखों में आँसू  मिले,
एक ही सिक्के के दो पहलू  निकले।
               कौन अपनाता मिला दुर्गन्ध को,
               हर किसी की चाह है खुशबु मिले।
अपने अपने हौसले की बात है,
सूर्य से भिड़ते हुए जुगनू मिले।
              रेत से भी निकल सकता है तेल,
              चाहत है वो कहीं बालू---- मिले।
आँकियें उन्माद -मद -तूफ़ान का,
सैकड़ो उड़ते हुए तम्बू----- मिले।

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

निराशा-गज़ल


आ समन्दर के किनारे पथिक प्यासा रह गया,
था गरल से जल भरा होकर रुआंसा रह गया।
                    था सफर बाकि बहुत मजिल अभी भी दूर  थी,
                    हो गया बढना कठिन घिर कर कुहासा रह गया।
लग रहे नारे हजारो छप रही रोज लाखो खबर,
गौर से जब  देखा तो बन तमाशा रह  गया।
                    एक बुत गढ ने लगी  अनजान  में ही  मगर,
                    हादसा ऐसा हुआ की वह बिन तराशा रह गया।
छोड़ कर  आशा किसी का चल पड़ा बेचारा"राज",
आज  बादा लोगो का  बस  दिलासा  रह   गया।

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

सदाए कैद करूं-गज़ल


सदाए कैद करूं  या आहटे  चुरा  ले जाउ,
महकते जिस्म की खुशबुए चुरा ले जाऊ।
                                तेरी अमानते महफूज रख न पाउँगा,
                                दुबारा लौट के आने का वादा न कर पाउँगा।
बला के शोर है तूफ़ान आ गया शायद,
कहाँ  का वक्त ऐ सफर खुद को ही बचा ले जाऊ।
                                कहना  है दरिया का  यह शर्त हार जायेगा,
                                जो एक दिन में उसे साथ बहा ले जाऊ।
अभी और न जाने कहाँ कहाँ भटकु,
कभी बहाया था दरिया में जो दिया ले जाऊ।



रविवार, 2 दिसंबर 2012

जीने की अरमान-गज़ल

                   
सांसे तो है मगर अब जीने की अरमान नही है,
देखा है जिन्दगी को इस कदर खुद की पहचान नही है।
                 दर्द है बिखरा है जहाँ में यहाँ से वहाँ  तलक,
                 बाँट ले गम थोडा सा ही ऐसा कोई इन्सान नहीं है  ।
खेल कर जी भर आग से कहने लगे है अब तो,
जलते तन मन के लिए बर्फ का सामान नही है।
                 गुल-ए-चमन में जग कर रात रात भर,
                 मायूस हो कहते है वो काँटों का बरदान नही है।
बुझेगी नही प्यास सुरा से,सुन्दरी से औ शबाब से,
जवानी तो दो घडी है हरदम तो इसका एलान नही है ।
                  लुट कर खुद गैर की आबरू दिन दहाड़े ही,
                  कहते है वो आदमी की शक्ल में भगवान नही है।
गवां दी उम्र सारी  मनमानी हरकतों के तहत।
थक गये तो कहते है सर पर आसमान नहीं है।
                  सभल जा अब भी थोडा वक्त है "राज",
                  जिन्दगी की राहों  को समझना आसन नही है।

जिस बात का डर था-गज़ल

जिस बात का डर था सोचा कल होगी,
जरखेज जमीनों में बिभार फसल होगी।

तफसील में जाने से ऐसा तो नही लगा,
हालात के नक्शों में अब फेरबदल होगो।

स्याही से इरादों की तस्वीर बनाते हो ,
गर ख़ूँ से तस्वीर बनाओ तो असल होगी।

लफ्जो से निपट सकती तो कब की पट जाती,
पेचीदा पहेली है बातो से न हल होगी।

इन अंधक सुरंगों में बैठे है तो लगता है,
बाहर भी अन्धेरे की बदशक्ल नकल होगी।

जो वज्म में आये थे बोल नही सके,
उन लोगो की हाथो में "राज" की गजल होगी।

तेरी वेवफाई (Teri vevfai)

Teri yaad dil se bhulane se pahme,
main roya bahut kht jlane se phle.

ye masum chehre bhi dete hain dhokha,
nhin smjhoge tum chot khane se phle.

jo pine ka tum men slika nhin hai,
chhlk jayega jam uthane se phle.

agr bevfai aapki main likhun,
kalam tut jaye chalane se pahle.

tum apne mahal ki bhi khuchh fikr krna,
garibo ka chhppr jalane se phle.

main duniyan ki roti ko phchanta hun,
jatayegi ahsa khilane se pahle.

lipt kr hr aek et se ro diye hmne,
purani haveli girane se pahle.

juban saf kr lijiye ae "Raj"
duaa ke liye hath uthane se pahle.

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

इंसानी चेहरे के पीछे- गज़ल



इंसानी    चेहरे के  पीछे  खूनी   मंजर  देखे  है,

और प्यार के उम्मीदों पर पड़ते पत्थर देखे है।


लहरों के पीछे हो जाना मुशिकल शायद नहीं रहा,
अपनी बस्ती में लोगो   के खौफ़जदा घर देखे  है।


जिसको हमने साथ किया था तन्हाई में चलने को,
न  वक्त में  उनके हाथ  में हमने  खंजर देखे है।


मंजिलो से कदमो को रिश्ता कितना मुश्किल है,
बरसातों में  कच्चे घर  के चुते  छप्पर  देखे   है।


अब तो चलना भी डर लगता है किसको हाथ साथ करे,
ऐ "राज"राह  बदल कर चलने वाले कितने रहवर देखे है।




शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

गम के आँसू-गज़ल

शायद वो आती  थी अब आना भूल गयी,
न जाने क्यू  वो साहिल अपना भूल गई।
                        रास्ता बदल गया वो दूर निकल गई।
                        माना  भूल गयी शायद अपना सपना भूल गई।
इस राह पर मै क्या रहकर  किये जा  हूँ,
कि खुद इस जख्म पर गुमराह किये जा रहा हूँ।
                        जिन्दगी के कुछ स्वप्न बना रखे थे हमने यहाँ,
                        पर "राज" खुद ही खुद को बेकरार किये जा रहा हूँ।
सोच सोच कर खुद जल रहा हूँ मैं यहाँ,
कि ख़ुशी के बदले गम के आँसू  बहा रहा हूँ।



गुरुवार, 29 नवंबर 2012

पिछले पहर-गज़ल

Rat ke pichhle pahar hmko sada deta hai kaun,
drde dil ke rog ki hashr ko dba deta hai kaun.

raat ke pichhale pahar hamako sada deta hai kaun,
darde dil ke rog kee hsr ko daba deta hai kaun

pahale to jalava dikha kar chhinakar hosho havaas,
 reshamee aanchal se phir hava deta hai kaun.

jis jamee mein ho chuke baaraha pevast ham, 
phir isee mittee se ye hamako bana deta hai kaun.

ham talaashe aadamiyat sabase bekhabar,
man ke mandir mein magar hamako saja deta hai kaun.

ham "raaj" ke dil mein arama rakhate hai sabase chhupae, 
dil mein aakar chupake se unako mita deta hai kaun.


मुनव्वर खान

बुधवार, 28 नवंबर 2012

गम दिखाने वाले-गज़ल

    हम हँसते है तो दुनियाँ  समझती है की हमे गम नहीं,
    वैसे भी  दुनिया में  गम  दिखाने  वाले कम   नहीं।

   गम  दिखाना भी लोगो ने बना लिया है एक  कम,
   उन्हें क्या मालूम गम में डूबी है मेरी सुबह--शाम।

   हम उन लोगो में से नहीं कि अपना गम दिखाते रहें,
   हम तो दुसरो के गम उठाए  बाटते.............  फिरे।

   दुनिया ने हर वक्त ऐसे लोगो को गलत ही समझा,
   अब  भी  कहते  रहना खुद की    बदौलत  समझा।

   हम दुनियां का कहना क्यों सोचे"राज"उनका गम नही,
   क्योकि गम है  पर  गम  दिखाने   वालो में  से हम नहीं।




                                                           "धन्यबाद"

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