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गुरुवार, 6 मार्च 2014

"निराशा"

आ समन्दर के किनारे पथिक प्यासा रह गया,
था गरल से जल भरा होकर रुआंसा रह गया।

था सफर बाकि बहुत मजिल अभी भी दूर थी,
हो गया बढना कठिन घिर कर कुहासा रह गया।

लग रहे नारे हजारो छप रही रोज लाखो खबर,
गौर से जब देखा तो बन तमाशा रह गया।

एक बुत गढ ने लगी अनजान में ही मगर,
हादसा ऐसा हुआ की वह बिन तराशा रह गया।

छोड़ कर आशा किसी का चल पड़ा बेचारा"राज",
आज वादा  लोगो का बस दिलासा रह गया।


गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

"हैवानियत का आलम'





चारों तरफ अजीब आलम हादसों में पल रही है जिंदगी,
फूलों  के  शक्ल में अंगारों  पर चल  रही है  जिंदगी.

आदमी  खूंखार  वहसी  हो  गए हैं इस जमाने में,
दूध साँपों को पिलाकर खुद तड़प रही है जिंदगी.

हमारी कौम ने जो बाग सींचे थे अपना लहू देकर,
उन्हीं बाग के कलियों का मसलना देख रही है जिंदगी.

उजड रहे हैं रोज गुलशन अब कोई नजारा न रहा,
तलवारों खंजरों रूपी दरिंदों से लुट रही है जिंदगी.

अब  तो यातनाओं  के अंधेरों में ही होता है सफर,
लुट रही बहन-बेटियाँ असहाय बन गयी है जिंदगी.

हर पल सहमी-सहमी है घर की आबरू बहन-बेटियाँ,
हर तरफ  हैवानियत का आलम नीलम ही रही है जिंदगी.

चुभती है  कविता ग़ज़ल सुनाने का न रहा अब हौसला,
 अब तो इस जंगल राज में कत्लगाह बन गयी है जिन्दगी.

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

ज़ख़्मों का आईना


   
हर एक चेहरे को ज़ख़्मों का आईना न कहो
ये ज़िन्दगी तो है रहमत इसे सज़ा न कहो
 
न जाने कौन सी मज़बूरियों का क़ैदी हो
 वो साथ छोड़ गया है तो बेवफ़ा न कहो

तमाम शहर ने नेज़ों पे क्यूँ उछाला मुझे
 ये इत्तेफ़ाक़ था तुम इस को हादसा न कहो

ये और बात कि दुश्मन हुआ है आज मगर
 वो मेरा दोस्त था कल तक उसे बुरा न कहो

हमारे ऐब हमें उँगलियों पे गिनवाओ
 हमारी पीठ के पीछे हमें बुरा न कहो

मैं वाक़ियात की ज़न्जीर का नहीं क़ायल
 मुझे भी अपने गुनाहों का सिलसिला न कहो

ये शहर वो है जहाँ राक्षस भी हैं बहुत
 हर एक तराशे हुए बुत को देवता न कहो

चलते चलते --
अब फिरते हैं हम रिश्तों के रंग-बिरंगे ज़ख्म लिये
सबसे हँस कर मिलना-जुलना बहुत बड़ी बीमारी है


(सादर आभार:राहत इन्दौरी)

बुधवार, 6 मार्च 2013

खफा-ए-जिन्दगी



 

 
खफा-ए -जिन्दगी  को भुला कर के  तो देखिए ,
ख्वाबो की दुनियाँ से निकल कर के तो देखिए ।
 
तेरी यादों के  ही  सहारे जी  रहें हैं  अब तलक,
दिल के झरोंखे में कोई दीप जला कर के देखिए। 
 
हम समझ न पाए अब तक आपकी रुसवाई को,
नस्तरे दिल से अपना इल्जाम हटा के तो देखिए।
 
दस्ताने-ए-दिल को मेरी जुबां से  सुना ही नही,
तिलिस्मे बेहिसी को कभी तोड़  के तो देखिए।
 
दर्दे-दिल को सहते हुए कितने सदियाँ गुजर गयी,
अपने माजी के मजार पर कभी आ कर के देखिए।
 
लगता अब उतर जायेंगे लहद में अहबाब के कांधों से,
रब के दर पर मेरे गुनाहों की सजा सुना कर तो देखिये। 
 
 
अर्थ:  तिलिस्मे =भवंर जाल, माजी=अतीत, मजार =कब्र, लहद=कब्र, अहबाब=मित्र जन 
 
 
चलते चलते प्रस्तुत है:
                                करोगे याद गुजरे हसीन यादों को,
                                         तरसोगे हमारे साथ एक पल बिताने को।
                                                         फिर आवाज दोगे हमें बुलाने को,
                                                                 नहीं दरवाजा होगा स्वर्ग से वापस आने का।।


मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

"क्या हो गए हैं यारों"




हम क्या थे अब क्या हो गए हैं यारों,
भूल अपनी मर्यादा बेपर्दा हो गए यारों।

चारो तरफ है फैला जुर्म का काला साया,
               अब साये से भी डर लगने लगा है यारों।

 
   रौशनी की फ़िक्र करता नही है अब कोई, 
हर तरफ तूफां का आलम सा है यारों।
 
लूट-खसोट,अत्याचार का है बाजार गर्म,
दरवाजे तो है बंद जाएँ तो किधर यारों।
 
उठ रहा हर तरफ बेबसी का धुंआ ही धुआं,
अब तो साँस लेना भी हो गया दूभर यारों।
 
तन पर न हो कपड़ा पावों से ढक लेंगे लाज को,
पर पावों को भी खिचने वाले हैं बहुत यारों।
 
रोज ही नए नए मंजर सामने आने लगे है,
हँसते हँसते ही लोग चिल्लाने लगे हैं यारों। 
 
देख दुर्दशा देश की बहुत दूर निकल आयें,
सात समन्दर पार  भी न चैन आया यारों।
 
                                                                                                                                                        

12 12

चलते चलते ..........
                           अब तो घबड़ा के यह कहते है कि मर जायेंगे,
                           मर कर  भी  चैन न पाया तो किधर  जायेंगे।

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

निराशा-गज़ल


आ समन्दर के किनारे पथिक प्यासा रह गया,
था गरल से जल भरा होकर रुआंसा रह गया।
                    था सफर बाकि बहुत मजिल अभी भी दूर  थी,
                    हो गया बढना कठिन घिर कर कुहासा रह गया।
लग रहे नारे हजारो छप रही रोज लाखो खबर,
गौर से जब  देखा तो बन तमाशा रह  गया।
                    एक बुत गढ ने लगी  अनजान  में ही  मगर,
                    हादसा ऐसा हुआ की वह बिन तराशा रह गया।
छोड़ कर  आशा किसी का चल पड़ा बेचारा"राज",
आज  बादा लोगो का  बस  दिलासा  रह   गया।

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

मशवरा-गज़ल

घर से निकलोगी तो सोचा है किधर जाओगी,
हर तरफ तेज हवा है टूट कर बिखर जाओगी।
               इतना आंसा नही लफ्जो पर  भरोसा  करना,
               जब घर की दहलीज पुकारेगी किधर जाओगी।
शाम होते ही सिमट  जायेगे  सारे  तेरे रास्ते,
बहते दरिया से जहाँ होगे  वही ठहर जाओगी।
               हर नये जगह में कुछ यादें कडवी होती हैं,
               छत से दीवारें जुदा होगी तो डर जाओगी।
पहले हर चीज नजर आयेगी बेमानी सी,
फिर  अपने   ही  नजरो से  उतर  जोगी।
              "राज" के नेक मशवरे  पर अमल  करना,
               रास्ते के बिकट भवँर  से निकल  जाओगी।



सोमवार, 3 दिसंबर 2012

सदाए कैद करूं-गज़ल


सदाए कैद करूं  या आहटे  चुरा  ले जाउ,
महकते जिस्म की खुशबुए चुरा ले जाऊ।
                                तेरी अमानते महफूज रख न पाउँगा,
                                दुबारा लौट के आने का वादा न कर पाउँगा।
बला के शोर है तूफ़ान आ गया शायद,
कहाँ  का वक्त ऐ सफर खुद को ही बचा ले जाऊ।
                                कहना  है दरिया का  यह शर्त हार जायेगा,
                                जो एक दिन में उसे साथ बहा ले जाऊ।
अभी और न जाने कहाँ कहाँ भटकु,
कभी बहाया था दरिया में जो दिया ले जाऊ।



रविवार, 2 दिसंबर 2012

जीने की अरमान-गज़ल

                   
सांसे तो है मगर अब जीने की अरमान नही है,
देखा है जिन्दगी को इस कदर खुद की पहचान नही है।
                 दर्द है बिखरा है जहाँ में यहाँ से वहाँ  तलक,
                 बाँट ले गम थोडा सा ही ऐसा कोई इन्सान नहीं है  ।
खेल कर जी भर आग से कहने लगे है अब तो,
जलते तन मन के लिए बर्फ का सामान नही है।
                 गुल-ए-चमन में जग कर रात रात भर,
                 मायूस हो कहते है वो काँटों का बरदान नही है।
बुझेगी नही प्यास सुरा से,सुन्दरी से औ शबाब से,
जवानी तो दो घडी है हरदम तो इसका एलान नही है ।
                  लुट कर खुद गैर की आबरू दिन दहाड़े ही,
                  कहते है वो आदमी की शक्ल में भगवान नही है।
गवां दी उम्र सारी  मनमानी हरकतों के तहत।
थक गये तो कहते है सर पर आसमान नहीं है।
                  सभल जा अब भी थोडा वक्त है "राज",
                  जिन्दगी की राहों  को समझना आसन नही है।

जिस बात का डर था-गज़ल

जिस बात का डर था सोचा कल होगी,
जरखेज जमीनों में बिभार फसल होगी।

तफसील में जाने से ऐसा तो नही लगा,
हालात के नक्शों में अब फेरबदल होगो।

स्याही से इरादों की तस्वीर बनाते हो ,
गर ख़ूँ से तस्वीर बनाओ तो असल होगी।

लफ्जो से निपट सकती तो कब की पट जाती,
पेचीदा पहेली है बातो से न हल होगी।

इन अंधक सुरंगों में बैठे है तो लगता है,
बाहर भी अन्धेरे की बदशक्ल नकल होगी।

जो वज्म में आये थे बोल नही सके,
उन लोगो की हाथो में "राज" की गजल होगी।

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

पिछले पहर-गज़ल

Rat ke pichhle pahar hmko sada deta hai kaun,
drde dil ke rog ki hashr ko dba deta hai kaun.

raat ke pichhale pahar hamako sada deta hai kaun,
darde dil ke rog kee hsr ko daba deta hai kaun

pahale to jalava dikha kar chhinakar hosho havaas,
 reshamee aanchal se phir hava deta hai kaun.

jis jamee mein ho chuke baaraha pevast ham, 
phir isee mittee se ye hamako bana deta hai kaun.

ham talaashe aadamiyat sabase bekhabar,
man ke mandir mein magar hamako saja deta hai kaun.

ham "raaj" ke dil mein arama rakhate hai sabase chhupae, 
dil mein aakar chupake se unako mita deta hai kaun.


मुनव्वर खान

बतलाता रहा-गज़ल

"बाज" जाने किस तरह हमसे यह बतलाता रहा,

क्यों परिंदों के दिलो से उसका डर जाता रहा।

मैंने जब आवाज को दफन कर दिया तब क्यों,
मुझे बाहर से____ महफिल में बुलवाता रहा।

आज गलियों में सदाए देता देता मर गया,
जो जिन्दगी भर गला औरो का दबवाता रहा।

बिना पत्ता का लिफाफा आग मुझमे है भरी,
लिखने वाला बंद कर कही भिजवाता रहा।

आया था तो मुस्कराए अब गया तो रोएं क्यों,
अपना उसका पेड़ पत्ती का सदा नाता रहा।

मैंने अम्बर को पिरो कर एक माला भी बना ली,
सामने आया तो कोई जब तब मै शर्माता रहा।

                                          
  अज्ञात 

बुधवार, 28 नवंबर 2012

जिन्दगी मयखाना है-गज़ल



जिन्दगी मयखाना है मदहोश होकर  जीना है,
कुरुक्षेत्र में आना है तो कुछ तो जरुर  खोना है।

जीवन एक संघर्ष है तो लड़कर ही कुछ पाना है,
तदिर का खेल है सुख-दुःख को आना जाना है।

कुछ लोग कायर है हर कदम पर गम को पीना है,
बाजुओं में दम है फिर भी ये करनी को रोना  है।

जीवन का सत्य है _______जहर को  खाना  है,
सुख वही है लूटो जो दूसरों के नसीब का दाना है।

चिता की अग्नि से लौटकर ख़ुशीके गीत गाना है,
अंतिम अरमान यही है चैन की नींद   सोना है।

चक्र यूं ही चलता रहता है "राज" बीज बोना है,
जिन्दगी मयखाना है _मदहोश होकर जीना है।



                                                           "धन्यबाद"

गम दिखाने वाले-गज़ल

    हम हँसते है तो दुनियाँ  समझती है की हमे गम नहीं,
    वैसे भी  दुनिया में  गम  दिखाने  वाले कम   नहीं।

   गम  दिखाना भी लोगो ने बना लिया है एक  कम,
   उन्हें क्या मालूम गम में डूबी है मेरी सुबह--शाम।

   हम उन लोगो में से नहीं कि अपना गम दिखाते रहें,
   हम तो दुसरो के गम उठाए  बाटते.............  फिरे।

   दुनिया ने हर वक्त ऐसे लोगो को गलत ही समझा,
   अब  भी  कहते  रहना खुद की    बदौलत  समझा।

   हम दुनियां का कहना क्यों सोचे"राज"उनका गम नही,
   क्योकि गम है  पर  गम  दिखाने   वालो में  से हम नहीं।




                                                           "धन्यबाद"

सोमवार, 26 नवंबर 2012

राजनीति की नालियाँ-गज़ल


उठाते हैं  तूफा  यहाँ  पर  प्यालियों  में    लोग,
जिनमे खाते छेद करते उन्ही थालियों में लोग।
                   पी -पी कर  सत्ता   की  मदिरा  बेहिसाब,
                   लुढ़क गए राजनीति की नालियों में लोग।
हर्ष के उन्माद में जलाकर किसी का  घर,
खो गये अपनी अपनी दीवालियों में लोग। 
                   चुटकी भर खुशहाली पाने की उम्मीद में,
                   जी  रहे  बरसो  से  बदहालियों   में लोग।
चमन में चुन चुन के जो नोचते है कलियाँ,
उन को भी गिन रहे  है  मालियों  में लोग।
                    नपुंसक भीड़ जुटा  करके अपने आस पास,
                    खुश हो रहे खरीदी हुई  तालियों  में  लोग।
या  जोड़ने में  लोग  खर्च कर देते जिन्दगी,
या बिताते है जिन्दगी रखवालियों में लोग।
                    उजाले में जो बाँटते गरीबो  में अन्न बस्त्र,
                    अँधेरे में शामिल वही मवालियो में  लोग।
कालिख को साफ करने के जरिये बहुत है "राज",
सो लगे है कोयले की दलाली में _______लोग।

गम में डूबे लोग-गज़ल

 
गम में डूबे से बेवाक नजर आने लगे है  लोग,
अपने में खोए अंजान नजर आने लगे है लोग।
          आज हर लम्हा बिखरने लगा ख्वाबो की तरह,
          क्यों बदलने लगे अपने लोग भी गैरो की तरह।
सच की निगाहों से कतराने लगे है लोग,
गम में डुबे से बेवाक नजर आने लगे है लोग।
          रुख यू बदलने लगे हर शख्स हवाओ की तरह,
            फरेब करने  लगा हर शख्स हवाओ की तरह।
घर बार छोड़ चौराहे पर आने लगे है लोग,
गम में डूबे बेवाक नजर आने लगे है लोग।
            जिन्दगी गुजरने  लगी दिन  की बुँदे  बनकर,
             आदमी सवरने लगा  अपने  में ही खो    कर।
अपने ही आप क्यों बहकने लगे है सारे लोग,
गम में डूबे बेवाक नजर आने  लगे हैं  लोग।
             इन्सान क्यों बनने लगा   मशीनों  की तरह,
             रंग में धूमिल हुए आज ये रिश्ते भी तमाम।
जिन्दगी इस तरह क्यों बोझ बनाने "राज",
गम में डुबे बेवाक नजर आने लगे हैं लोग।

रविवार, 25 नवंबर 2012

पहले कभी (Pahle kabi) -गज़ल

Jis tarh dekha hai ab phle kabhi dekha n tha,
Itani sidhat se use maine kabhi chaha nhi tha.

Dekhte hin dekhte najron se oojhl ho chali,
Abhi to ji bhr ke maine use dekha bhi n tha.

Janta tha ki yah honi hai judai aek din,
Vah achank bichhud jayegi yah socha n tha.

Pahle pane ki khushi thi ab khone ka hai gam,
Khavabonki duniya main gam dil dhadka n tha.

Dard un aankhon ka jo takte huae pathra gayi,
Matam un aansun ka jo nyno se dhlka n tha.

Aaene se khwab mere reja-reja ho gye,
Main tilsmi bandison ko todkr nikla n tha.

Kya tere bite huae anmol chhn nind ke spne ho gye,
Main to moti tha tere dil ka koai tinka n tha.

Silsila dr-silsila hai sb shrabe jindgi,
Jahr chakhne ka yah "Raj" ka tajurba phla n tha.
"Anwar mahmud khalid"



बेबस यों बेकरार-गज़ल


ऐसे बेबस यों बेकरार है हम, 
जिन्दगी तेरे गुनाहगार ही हम।


जो भी आया किनारा कर गया,
 और किनारों से दरकिनार है हम।


दिन जो गुजरे वो कदर याद आये, 
अपने अतीत की ही मजार है हम।

गुजरी हर   हद से उनकी बेदर्दी,
 अब  तो  बेचैन  औ  जार-जार है  हम।

इतनी बेमानी है जिन्दगी ऐ"राज",
अक्स पर  ही अपने  शर्मसार है  हम




शनिवार, 24 नवंबर 2012

Ghazal-Life (जिन्दगी)

kuchh ham bhi khil gye hain tumhari kitab main,
ganga ke jal ko dhal n dena shrab main.

ham se to jindgi ki kahani n ban saki,
sade hi rah gye sabhi panne kitab main.

duniyan ne kiya tha kabhi chhota sa aek swal,
hamne jindgi hi luta di aapke jabab main.

lete n muhn fer hamari taraf se aap,
kuchh khubiyan bhi dekhate khankharab main 

kuchh bat hai ki aapko aaya hai aaj pyar,
dekha nhin tha jwar yon moti ke aab men 





साभार:गुलाब खंडेलवाल 




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