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सोमवार, 20 मई 2013

"जबकि मैं मौन हूँ"





जबकि मैं मौन हूँ,
मौन रह कर क्या
बता पाउँगा इस दुनियाँ को
मेरे दिल में भी कुछ जज्बात मचलते हैं
दिलों से बर्फ पिघलते हैं
मैं भी आशा रखता हूँ की
प्यार की कलियाँ महके
सदभावना की नदियाँ बहे
मेघ के रह ताल पर
प्यार की बरसात हो
मैंने तो चाँद को भी देखा है हमेशा
चकोर की नजर से
चकाचौंध से भरी इस दुनियाँ में
मेरी भी चाहत है
किसी दिल रूपी प्रेम वीणा का
अछूता तार बनूँ
कोई मेरे हृदय के मौन भाषा को समझे
मैं तो भटकता हूँ रौशनी के लिए
पर गगन में कहीं कोई तारा ही नही
लगता है यह इस सदी का
कोई खतरनाक हादसा है
जो आज तक समझ ही न पाया.

बुधवार, 8 मई 2013

"मेरी विवशता"





मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
पथ ही मुड़ गया था.
गति मिली, मैं चल पड़ा,
पथ पर कहीं रुकना मना था
राह अनदेखी, अजाना देश,
संगी अनसुना था.
चाँद सूरज की तरह चलता,
न जाना रात दिन है
किस तरह हम-तुम गए मिल,
आज भी कहना कठिन है.
तन न आया माँगने अभिसार
मन ही जुड़ गया था
मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
पथ ही मुड़ गया था.
देख मेरे पंख चल, गतिमय
लता भी लहलहाई
पत्र आँचल में छुपाये
मुख-कली भी मुस्कुराई
एक क्षण को थम गए डैने
समझ विश्राम का पल
पर प्रबल संघर्ष बनकर
आगई आंधी सदल-बल
डाल झूमी, पर न टूटी
किंतु पंछी उड़ गया था
मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
पथ ही मुड़ गया था.
************************
ध्यान तक विश्राम का पथ पर महान अनर्थ होगा,
ऋण न युग का दे सका तो जन्म लेना व्यर्थ होगा।

                              सादर आभार:शिवमंगल सिंह 



बुधवार, 1 मई 2013

चुनावों की तैयारी





चुनावों की तैयारी
चल रही है जोरो पर
आम जनता को
लुभाने के लिए
कितने कारखाने लगवायें हैं
चमकीले लोलिपाप की
टोपी खद्दर पहन कर
निकलेंगे बाहर
भ्रष्ट राजनीती की नालियों से
फिर देंगे झांसा आगे की खुशहाली का
चुटकी भर खुशहाली
पाने की लालच में हम
बिक जायेंगे इन मवालियों के हाथ
जुटा लेंगें अपने चारो तरफ भीड़
गूंज उठेगा मैदान
खरीदी हुई तालियों से,
कागजो पर ही बनायेंगे पुलों के नक्से
देश के नव निर्माण की
करेंगे बड़ी बड़ी बातें
देंगे शांति समृद्धि का आश्वासन
चुनावों के बाद
मिलेगी जब मखमली कुर्सी
भूल जायेंगे किये वादों और आश्वासन को
मौज मस्ती में ठाट से जिएंगें
और जनता का ही खून पियेंगे.

रविवार, 28 अप्रैल 2013

धरती माँ


ठीक है, तुम खूब शरारतें करो,
दीवारों और ऊंचे वृक्षों पर चढो,
अपनी साइकलों को जिधर चाहो घुमाओ-फिराओ,
तुम्हारे लिए यह जानना अनिवार्य है
कि तुम इस काली धरती पर
किस प्रकार बना सकते हो अपना स्वर्ग
तुम चुप कर दो उस व्यक्ति को
जो तुम्हें पढाता है कि यह सृष्टि
आदम से प्रारम्भ हुई
तुम्हें धरती के महत्त्व को स्वीकारना है.
तुम्हें विश्वास करना है कि धरती शाश्वत है.
अपनी माँ और धरती माँ में कभी भेद मत करना
इस से उतना ही प्यार करना
जितना अपनी माँ से करते हो. 


चलते चलते......

चादर पर इंसानियत की गहरा दाग लगाया है
जिसकी दवा मुमकिन ही नहीं वह ज़ख्‍म जहां से पाया है


                                                                      आभार - नाज़िम हिकमत

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

"खुली आँखों से ख्वाब"





                                                                                                                                                                 
देखता रहा,
खुली  आँखों से ख्वाब
जहां में फैली हुई
हैवानियत के मंजरों को
हर पल होते हुए
कत्ल,चोरी.रहजनी और दुराचार को 
सुख-चैन लूटते हाथों से
मिलती ब्यथाएं अनतुली
थरथराती बुनियादें
दम बेदम फरियादें
खौफ का एहसास कराती
खून से लथपथ हवायें
शाम होते ही
सिमटते सारे रास्ते
मची है होड़ हर तरफ
धोखा,झूठ,फरेब और बेईमानी की
नेकी की राहों में फैली
बिरानगीं और तीरगी का बसेरा
पहलू बदल कर ली अंगडाई
पर न कोई इन्कलाब दिखा
जी रहे हैं सभी यहाँ
आपसी रंजिसों के साथ
भला कब तक ?
ये भी कोई जीना है.
                                                                                                  

रविवार, 17 मार्च 2013

कैसी ये सरकार


  कैसी ये सरकार
  झुठ-फरेब का ही
  कर रही व्यापार
  गूंगे बहरे बने रहने में
  सोचती है भलाई
  दुश्मन देते घाव पर घाव
  न किया कभी भी
  उन पर फुँफकार
  अमन चैन को तरसती
  बेबस जनता
  हो रही भेड़ियों के शिकार
  न्याय कानून का रास्ता
  केवल गरीबों को नापता
  बाहुबली खुले घूम रहें
  खद्दर टोपी के साये में
  महंगाई हर पल बढ़ रही
  सुरसा के मुहँ की तरह
  नेता बैठे ए सी केबिन में
  बजाते हैं केवल गाल
  आम जनता जी रही
  बेबसी और लाचारी में
  मस्ती में घूम रहें
  नेता और शिकारी
  न करता कोई 
  दिल से इनका विरोध
  लूट रहे हैं लूटने दो
  आज उनका दौर है
  कल हमारा भी होगा



 

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

मत मारो माँ




 
       माँ ,माँ,ओ मेरी माँ              
तुम सुन रही हो मुझे
मैं तो अभी तेरी कोख में हूँ 
जानती हूँ एहसास है तुझे
आज मैंने सुना 
पापा की बातें
उन्हें बेटी नही बेटा चाहिए 
मैं बेटी हूँ,इसमें मेरा क्या दोष 
मईया मैं  तो तेरा ही अंश  
तेरे ही जिगर का टुकड़ा 
तेरे ही दिल की  धडकन 
क्या तुम भी 
मुझे मरना चाहती हो 
मुझे मत मरो माँ 
मुझे जग में आने दो न 
मैं तेरी  बगिया की कली 
तेरा जीवन महका दूँगीं 
तेरे सपने सच कर  दूँगी 
जीवन के हर पग पर 
तेरा साथ न छोडूंगी 
तेरा दुःख मेरा दुःख होगा 
माँ समझाना पापा को 
मैं पापा पर न बनूँगी बोझ 
पढ़ लिख कर 
छूऊँगी जीवन के उच्च शिखर को 
एक दिन करेंगे फक्र मुझपर 
बनूँगी लक्ष्मी घर की तेरी 
माँ ओ मेरी प्यारी माँ 
अजन्मी बेटी तुझे पुकार रही 
मत करना मुझे मशीनों के हवाले
मत मारना मुझे।
 
                                                       
 
                                                                                                                     
 एक प्रयास,"बेटियां बचाने का".......


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