जीवन मृत्यु तो एक परम सत्य,
फिर क्यों मृत्यु से भय खाते हो।
हर पल सुख के सागर में डूबे,
अब दुःख में क्यों घबडाते हो।
सुख-दुःख तो चलते चक्र से,
एक जाता एक आता है।
दुःख जायेगा सुख आएगा,
अब क्यों मातम मनाते हो।
जीवन भर किया मनमानी,
उम्र गुजार दी रंगरेलियों में।
सुख के क्षणों में भूल गये दाता को,
अब क्यों त्राहि माम की गान सुनते हो।
सुख तो चार दिन की चाँदनी,
फिर अँधेरों से क्यों घबराते हो।
हे मानस के "राज"हँस,
सुख-दुःख की चिंता छोड़ो,
इह लोक में करो पूण्य-कर्म ,
परलोक तो सुधर जायेगा।
जीवन-मृत्यु तो एक परम सत्य,
एक दिन सबको चले जाना है।
