तूफां से डरकर लहरों के बीच सकारे कहाँ जाएँ,
इस जहाँ में भटककर तकदीर के मारे कहाँ जाएँ ।
अब तो खिंजा भी गुल खिलाने लगे है,
अपनी बेबसी को लेकर बहारें कहाँ जाएँ।
उम्मीदे थी जिसकी चाहत का ...........हमेशा,
हम तुमसे छुड़ाकर दामन बेसहारे कहाँ जाएँ।
उजाला हैं जहाँ में ऐ चाँद तेरी चांदनी से,
बता फलक के अभागे सितारे कहाँ जाएँ।
नाम था लबों पे खुद के बाद तुम्हारा ऐ हंसी,
तुम्हारे नाम का वो जहां के लुटेरे कहाँ जाएँ।
हंसी मंजर था चाहत के लम्हे गुजरा था ऐ "राज"
सिसक-सिसक कर वो रंगीन नजारें कहाँ जाएँ।
जब नाव जल में छोड़ दी तूफ़ान में ही मोड़ दी,
दे दी चुनौती सिन्धु को तो धार क्या मझधार क्या !
(सादर आभार)

