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सोमवार, 29 अप्रैल 2013

धरती माँ


ठीक है, तुम खूब शरारतें करो,
दीवारों और ऊंचे वृक्षों पर चढो,
अपनी साइकलों को जिधर चाहो घुमाओ-फिराओ,
तुम्हारे लिए यह जानना अनिवार्य है
कि तुम इस काली धरती पर
किस प्रकार बना सकते हो अपना स्वर्ग
तुम चुप कर दो उस व्यक्ति को
जो तुम्हें पढाता है कि यह सृष्टि
आदम से प्रारम्भ हुई
तुम्हें धरती के महत्त्व को स्वीकारना है.
तुम्हें विश्वास करना है कि धरती शाश्वत है.
अपनी माँ और धरती माँ में कभी भेद मत करना
इस से उतना ही प्यार करना
जितना अपनी माँ से करते हो. 


चलते चलते......

चादर पर इंसानियत की गहरा दाग लगाया है
जिसकी दवा मुमकिन ही नहीं वह ज़ख्‍म जहां से पाया है


                                                                      आभार - नाज़िम हिकमत