मानव में गर शक्ति होती
प्रार्थना की उत्पति न होती
मानव में गर भक्ति होती
प्रार्थना की संतति न होती।
मानव में गर विरक्ति होती
लोभ-वृति कतई न होती
शक्ति,भक्ति,विरक्ति,
प्रार्थना की देन है बन्धु !
कहता है सत-चित-ज्ञान सिन्धु
विन्दु में झरे बिन सिन्धु
सुज्ञान की वर्षा न होती
जहाँ पर मति सोती
वहाँ कलह होती।
घर,गावँ,शहर में होती
प्रदेश और देश में होती
मानव में गर शक्ति होती
दानव की उत्पति न होती।
प्रार्थना में है शक्ति
शक्ति में है भक्ति
भक्ति में है विरक्ति
विरक्ति में है जीवन
जीवन ग्रहण कीजिये
मरना को मुक्ति दीजिये
इसी में है बहु-जन हित
इसी में है देश हित।
