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बुधवार, 23 जनवरी 2013

बीते हुए पल





 
              बीते हुए पल को याद कर रोना अच्छा लगता है,
              हम भी यादों में पागल हो जायेंगे ऐसा लगता है। 
                         हसीन पलों  की  यादें  रोज ही मिलने  आती है,
                         अँधेरे दिलो में अब तो ख्वाबो का मेला लगता है।
              प्यार के  दो ... मीठे बोल के तरसते हुए दिल को,
              अपने आँसूं के बूंदे ... ही अब समन्दर लगता है।
                         किसको अपना कहूँ कौन इस दुनियाँ में पराया,
                         गम-ए-सार दिल में तो अभी एक चेहरा अपना है।
              कभी कभी तेरी यादों के सावली रातों ......... में,
              बहते अश्को का ही समन्दर ..... नजर आता है।
                          "राज" दुनियाँ  में  चुप ही  रहे तो  बेहतर है,
                           राई से पहाड़ बनाना तो लोगो की फितरत है।
              गुल-ए-चमन में जाग  कर रात-रात भर .........,
              बीते हुए पल को याद कर रोना अच्छा लगता है।

 

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

दीवानों की तरह


आप मेरे गलियों में आये हैं दीवानों की तरह,
मैं चला जाऊंगा कहीं  और बहानों  की तरह।

ऐसे न देखिये हमे हम दीवाना हुए जा रहें,

कसम खा के कह रहें हम परवाने हुए जा रहें।

हम तो मर जायेंगे अब यहाँ लाशो की तरह,

आप मेरे गलियों में आये हैं दीवानों की तरह,

ऐसे पलक ना झुकाइए शर्म के ......मारे मारे,

कितना प्यार करते हैं हमे बताइये ऐ  प्यारे।

हम पर भी बरस जाईये  बरसातों  की तरह,

आप मेरे गलियों में आये हैं दीवानों की तरह।

क्यों मिलते हैं हमसे अंजानो को तरह,

आ जाओ पास हमारे दीवानों की तरह।

दिल से जुदा "राज" को पहचानेगे किधर,

आप मेरे गलियों में आये हैं दीवानों की तरह।






शनिवार, 8 दिसंबर 2012

आँसू


दर्द सीने  से उठा तो आँखों से आँसू निकले,
रात आयी तो गजल कहने के पहलु निकले।
              दिल का हर दर्द यु शेरो में उभर आया है,
              जैसे मुरझाये हुए फूलो में खुशबु निकले।
जब भी बिछड़ा है कोई शख्स तेरा ध्यान आया,
हर नये गम से  तेरी याद  के  पहलु--  निकले।
              अश्क उमड़े तो सुलगने लगी  यादे 'राज' की,
              खुश्क पत्तो को जलते हुए जुगनू--- निकले।











सोमवार, 3 दिसंबर 2012

जीने की अरमान-गज़ल

                   
सांसे तो है मगर अब जीने की अरमान नही है,
देखा है जिन्दगी को इस कदर खुद की पहचान नही है।
                 दर्द है बिखरा है जहाँ में यहाँ से वहाँ  तलक,
                 बाँट ले गम थोडा सा ही ऐसा कोई इन्सान नहीं है  ।
खेल कर जी भर आग से कहने लगे है अब तो,
जलते तन मन के लिए बर्फ का सामान नही है।
                 गुल-ए-चमन में जग कर रात रात भर,
                 मायूस हो कहते है वो काँटों का बरदान नही है।
बुझेगी नही प्यास सुरा से,सुन्दरी से औ शबाब से,
जवानी तो दो घडी है हरदम तो इसका एलान नही है ।
                  लुट कर खुद गैर की आबरू दिन दहाड़े ही,
                  कहते है वो आदमी की शक्ल में भगवान नही है।
गवां दी उम्र सारी  मनमानी हरकतों के तहत।
थक गये तो कहते है सर पर आसमान नहीं है।
                  सभल जा अब भी थोडा वक्त है "राज",
                  जिन्दगी की राहों  को समझना आसन नही है।

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

गम के आँसू-गज़ल

शायद वो आती  थी अब आना भूल गयी,
न जाने क्यू  वो साहिल अपना भूल गई।
                        रास्ता बदल गया वो दूर निकल गई।
                        माना  भूल गयी शायद अपना सपना भूल गई।
इस राह पर मै क्या रहकर  किये जा  हूँ,
कि खुद इस जख्म पर गुमराह किये जा रहा हूँ।
                        जिन्दगी के कुछ स्वप्न बना रखे थे हमने यहाँ,
                        पर "राज" खुद ही खुद को बेकरार किये जा रहा हूँ।
सोच सोच कर खुद जल रहा हूँ मैं यहाँ,
कि ख़ुशी के बदले गम के आँसू  बहा रहा हूँ।