हम बहुत सी परम्पराओं, अंधविश्वासों को बिना कुछ विचार किये ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेते हैं. यह भी नहीं देखते कि आज के परिपेक्ष्य में इसकी कोई प्रासंगिकता है भी या नहीं इसके पीछे कोई तर्क संगत आधार है कि नहीं. कहीं अंधविश्वास का तो हम अनुपालन नहीं कर रहे हैं. हमारी बहुत सी मान्यताएं विज्ञान / आधुनिक ज्ञान की कसौटी पर खरी नहीं उतरती हैं.यह हमारी बेड़ियाँ बन जाती हैं. समाज के विकास और प्रगति के लिए इन बेड़ियों को तोड़ देना ही बेहतर होगा. एक गतिशील समाज को अपनी मान्यताओं / परम्पराओं की सार्थकता पर निरंतर विचार करते रहना चाहिए. जो मान्यताएं समय के अनुरूप हों, समाज की प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती हों, उन्हें ही स्वीकृति मिलनी चाहिए आधारहीन परम्पराएं किस प्रकार अंधविश्वास का रूप ले लेती हैं।
इसी सन्दर्भ में एक प्राचीन कहानी को देखते हैं।
एक फकीर किसी बंजारे की सेवा से बहुत प्रसन्न हो गया। और उस बंजारे को उसने एक गधा भेंट किया। बंजारा बड़ा प्रसन्न था।
