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सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

दहेज की बलिवेदी



 
 
 
बड़ी मन्नतों के बाद
 घर में आयी एक नन्ही सी कली
रूप सलोना चेहरे पर थी मुस्कान
घर आँगन हुआ उपवन
नन्ही किलकारियों से
गुंज उठा घर आँगन
मिला हमेशा लाड दुलार
पाल पोस बनाया फूलों सा
एक दिन बनी किसी के गले की हार
नये घर गयी लक्ष्मी मी तरह
पर किया गया तानों से स्वागत
रूप गुण का न किसी ने किया ख्याल
गाड़ी भर न लायी दहेज
इसका है सबको मलाल
मारपीट,दुत्कार का दिया उपहार
मानवता भूल दानवता पर सब उतरे
दिन पर दिन बीते
कब तक सहती ये अत्याचार
खुनी दांतों के बीच बेचारी
दरिंदो ने कर दिया प्राणों का अंत
दहेज की बलिवेदी पर
एक अबला का हुआ अंत
न जाने कितनी ही बेटियाँ
हर रोज हो रही है बलिदान
क्या हो गया है मानवता का अंत
दहेज प्रथा है एक अभिशाप
खुल कर करे इसका बिरोध।