जो कर रही थी इंतजार
पल पल क्षण क्षण
अपने खिल जाने का
अपने मुस्कराने का
अपनी खुशबु सिमटने का
आखिर वह दिन आ ही गया
कली अधखिली और
आगे खिलने लगी
मंद मंद पवन के साथ
झूम कर खिलखिलाने लगी
फैला खुशबु उपवन में
भौरे करने लगे गुंजन
कोयल भी प्रेमगीत गाने लगी।
कोयल भी प्रेमगीत गाने लगी।
"अक्स खुशबु हूँ बिखरने से न रोके कोई
और बिखर जाऊं तो मुझको न समेटे कोई"
(आभार )
और बिखर जाऊं तो मुझको न समेटे कोई"
(आभार )
