रविवार, 13 अक्तूबर 2013

लौटकर आया नहीं



फूल की बातें सुनाकर वो गया,
किस अदा से वक़्त काँटे बो गया ।

गाँव की ताज़ा हवा में था सफ़र,
शहर आते ही धुएँ में खो गया ।

मौत ने मुझको जगाया था मगर,
ज़िंदगी के फ़लसफ़ों में सो गया ।

मेरा अपना वो सुपरिचित रास्ता,
कुछ तो है जो अब तुम्हारा हो गया ।

पा गया ख़ुदगर्ज़ियों का राजपथ,
रास्ता जो भी सियासत को गया ।

सीख तेरी काम आ जाती मगर,
हाथ से निकला जो अवसर तो गया ।

कौन बतलाए हुआ उस पार क्या,
लौटकर आया नहीं है जो गया ।
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वो सफ़र में साथ है पर इस अदाकारी के साथ ।
जैसे इक मासूम क़ातिल, पूरी तैयारी के साथ ।

                                                                           सादर आभार : विनय मिश्र 

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