यहाँ पति का घर, वहाँ पिता का घर,
उधर शायद पुत्र का घर,
पिता घर परायी पराये घर जाना है,
पति के घर परायी पराये घर से आयी है,
पुत्र के घर परायी .........शायद पुरानी है,
ऐसा जगह कहाँ जहाँ वो परायी नही ?
क्या परायी स्त्री हमेशा परायी रहेगी,
परायी स्त्री ही हमारी माँ,बहन और बेटी है,
बेटी को परायी कहना क्या तुम्हे स्वीकार है,
परायी बेटी के क्या है नसीब में,
क्या वह परायी ही रहेगी।
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जवाब देंहटाएंसभी पोस्ट को गूगल+ पर शेयर करते है।गूगल+ पर शो होता भी है।इस ब्लॉग का फीड हो चूका है,पता बदलने के लिए बाद में देखेंगे।
हटाएंVery nice Rajendra ji.
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंस्त्री के बारे में की गयी मार्मिक अभिब्यक्ति,बहुत ही सुंदर।
जवाब देंहटाएंबेटी कभी पराई नही होती,लेकिन घर जरूर पराया हो जाता है,,,,
जवाब देंहटाएंrecent post: वह सुनयना थी,
सुंदर , सार्थक , श्रेष्ठ सृजन करते रहें …
जवाब देंहटाएंस्त्रियों की व्यथा समझाने का सार्थक प्रयत्न सुंदर कविता के माध्यम से.
जवाब देंहटाएंयूँही लिखते रहिये. आपका ब्लॉग भी मैंने ज्वाइन किया है. मेरे ब्लॉग पर भी पधारे.
धन्यबाद रचना जी।
जवाब देंहटाएंस्त्रियों के स्थिति को उजागर करने वाली बहुत ही सुंदर रचना है।
जवाब देंहटाएंबेटियों को परायी समझना हमारी मूढ़ता है,बहुत ही अच्छी रचना।
जवाब देंहटाएंपराया कहने वाले ये भूल जातें हैं ....कि इस धरती पर इन्हें यही लेके आई है ....बहुत सुन्दर प्रस्तुति ..
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छा लिखा है आपने
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुतीकरण.
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