सोमवार, 29 अप्रैल 2013

धरती माँ


ठीक है, तुम खूब शरारतें करो,
दीवारों और ऊंचे वृक्षों पर चढो,
अपनी साइकलों को जिधर चाहो घुमाओ-फिराओ,
तुम्हारे लिए यह जानना अनिवार्य है
कि तुम इस काली धरती पर
किस प्रकार बना सकते हो अपना स्वर्ग
तुम चुप कर दो उस व्यक्ति को
जो तुम्हें पढाता है कि यह सृष्टि
आदम से प्रारम्भ हुई
तुम्हें धरती के महत्त्व को स्वीकारना है.
तुम्हें विश्वास करना है कि धरती शाश्वत है.
अपनी माँ और धरती माँ में कभी भेद मत करना
इस से उतना ही प्यार करना
जितना अपनी माँ से करते हो. 
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चलते चलते......

चादर पर इंसानियत की गहरा दाग लगाया है
जिसकी दवा मुमकिन ही नहीं वह ज़ख्‍म जहां से पाया है


                                                                      आभार - नाज़िम हिकमत

20 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर बात कही है आपने! बधाई भाई जी इस सुन्दर रचना के लिए।

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  2. मां और धरती की तुलना सार्थक। पर दुःख इस बात का है आधुनिकता में बहता समाज मां के साथ भी और धरती के साथ भी अन्याय कर रहा है। ऐसे में आपकी कविता पाठकों को जागृत करेगी।

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  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति..... मैं धरती हूँ .

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  4. bahut khoob......kash sab aisa soochte...tho aaj hamari dharti kitni khushal hoti

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  5. धरती तो माँ ही होती है ... वो हमें पालती है ओर बदले में कुछ नहीं मांगती ...
    उम्दा प्रस्तुति ..

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  6. सटीक और सार्थक प्रस्तुति!

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  7. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,आभार.

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  8. धरती हमारी माँ हैं,बहुत ही सुन्दर कविता का सृजन.

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  9. सुन्दर और सटीक रचना की प्रस्तुति,शुक्रिया.

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  10. बहुत ही बेहतरीन कविता की रचना,धन्यबाद.

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  11. बहुत ही बोधकारी कविता....आभार.

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  12. सच में धरती हमारी माँ के समान ही हैं,सुन्दर कविता.

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  13. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार के "रेवडियाँ ले लो रेवडियाँ" (चर्चा मंच-1230) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  14. माँ और धरती माँ का अच्छा महात्म बताया

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  15. माँ तो बस माँ ही है यह धरती माँ भी तो माँ की तरह ही तो पोषण करती है ...

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  16. बिलकुल..माँ जैसे आदर की ज़रुरत है....

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आपकी मार्गदर्शन की आवश्यकता है,आपकी टिप्पणियाँ उत्साहवर्धन करती है, आपके कुछ शब्द रचनाकार के लिए अनमोल होते हैं,...आभार !!!