शनिवार, 7 अप्रैल 2018

मैं तेरे आरजू से

मैं  तेरे आरजू से  सख्त  घायल  हो गया,
इस कदर चाहा की नीम पागल हो गया। 

रेत का अबंर रातो रात दलदल हो गया,
रोया कोई इस तरह की सहरा भी जलधल हो गया। 

आसुओं का इक समंदर जब्ज कर  के दोस्तों,
देखते ही  देखते वह  शख्स  बादल  हो गया। 

आदमी खूंखार व् वहशी  हो गए इस दौर में,
और उनकी मेहरबानी शहर जंगल हो गया। 

धूप भी सुहानी थी तुम्हारे साथ-साथ ,
तुम नहीं तो शाम का साया बोझिल हो गया। 

रात मैंने ऐसा ख्वाब देखा की क्या कहूँ,
तुझसे लिपटा मैं तेरा रंगीन आँचल हो गया। 

हाय वह चेहरा ख्याल आता है अब भी मुझे,
मेरी चश्मे याद से भी वो ओझल हो गया। 

उस सलोनी सूरत को आँखों में संजोये,
राज तेरी याद में पागल दीवाना हो गया। 


अज्ञात

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13 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन प्रस्तुति, आभार।

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  2. बहुत ही रोचक एवं हृदय को छू लेने वाली कविता है। अति सुन्दर प्रतुति। .

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  3. बहुत ही रोचक एवं हृदय को छू लेने वाली कविता है। मन प्रसन्न हो गया | अति सुन्दर प्रतुति।

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