सोमवार, 27 मई 2013

आग नफ़रत की



अब गए वक़्त क़े हर ग़म को भुलाया जाए
प्यार ही प्यार को परवान चढ़ाया जाए

आग नफ़रत की चमन को ही जला दे न कहीं
पहले इस आग को मिल-जुल के बुझाया जाए


सरहदें हैं कोई क़िस्मत की लकीरें तो नहीं
अब इन्हें तोड़ के बिछड़ों को मिलाया जाए

आतशी झील में खिल जाएँ मुहब्बत के कँवल
अब कोई ऐसा ही माहौल बनाया जाए

सिर्फ़ ज़ुल्मों की शिकायत ही करोगे कब तक
पहले मज़लूम की असमत को बचाया जाए

साज़िशें फिरती हैं कितने मुखौटे पहने
उनकी चालों से सदा ख़ुद को बचाया जाए

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अब मेरा दिल कोई मजहब न मसीहा मांगे
ये तो बस प्यार से जीने का सलीका माँगे
ऐसी फसलों को उगाने की जरूरत क्या है
जो पनपने के लिए खून का दरिया माँगे   
                                सादर आभार: अजीज आजाद

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