दर्द सीने से उठा तो आँखों से आँसू निकले,
रात आयी तो गजल कहने के पहलु निकले।
दिल का हर दर्द यु शेरो में उभर आया है,
जैसे मुरझाये हुए फूलो में खुशबु निकले।
जब भी बिछड़ा है कोई शख्स तेरा ध्यान आया,
हर नये गम से तेरी याद के पहलु-- निकले।
अश्क उमड़े तो सुलगने लगी यादे 'राज' की,
खुश्क पत्तो को जलते हुए जुगनू--- निकले।
aapke gazal ka roj hi intjar rahta hai.
जवाब देंहटाएंRamesh chandra
वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया मदन भाई, हमेशा आपका इंतजार रहेगा।
हटाएंसुंदर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंनववर्ष की हार्दिक बधाई।।।
आपको भी नवबर्ष का हार्दिक अभिनन्दन।
हटाएंबहुत बढ़िया ...
जवाब देंहटाएंनववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें!
क्या खूब गजल है..
जवाब देंहटाएंऔर ब्लॉग भी बहुत सुन्दर है...
:-)
Thanks Reena ji.
हटाएंबेहतरीन ग़ज़ल...
जवाब देंहटाएंक्या बात है ....!!
जवाब देंहटाएंहम भी उसी बालू को ढूंढ रहे हैं ....:))
ब्लॉग आने के लिए बहुत शुक्रिया हरकीरत जी,धन्यबाद।
हटाएंबहुत ही सुन्दर ग़ज़ल की प्रस्तुति,धन्यबाद.
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