मंगलवार, 16 अप्रैल 2013

ज़ख़्मों का आईना


   
हर एक चेहरे को ज़ख़्मों का आईना न कहो
ये ज़िन्दगी तो है रहमत इसे सज़ा न कहो

न जाने कौन सी मज़बूरियों का क़ैदी हो
 वो साथ छोड़ गया है तो बेवफ़ा न कहो


तमाम शहर ने नेज़ों पे क्यूँ उछाला मुझे
 ये इत्तेफ़ाक़ था तुम इस को हादसा न कहो


ये और बात कि दुश्मन हुआ है आज मगर
 वो मेरा दोस्त था कल तक उसे बुरा न कहो


हमारे ऐब हमें उँगलियों पे गिनवाओ
 हमारी पीठ के पीछे हमें बुरा न कहो


मैं वाक़ियात की ज़न्जीर का नहीं क़ायल
 मुझे भी अपने गुनाहों का सिलसिला न कहो


ये शहर वो है जहाँ राक्षस भी हैं बहुत
 हर एक तराशे हुए बुत को देवता न कहो

चलते चलते --
अब फिरते हैं हम रिश्तों के रंग-बिरंगे ज़ख्म लिये
सबसे हँस कर मिलना-जुलना बहुत बड़ी बीमारी है


(सादर आभार:राहत इन्दौरी)
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18 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी गजल ... ये ज़िन्दगी तो है रहमत इसे सज़ा न कहो

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  2. बहुत सुन्दर...
    पधारें "आँसुओं के मोती"

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  3. सुन्दर गजल राजेंद्र जी आभार।

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  4. लाजवाब गज़ल .. ओर सभी शेर कमाल के ...

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  5. हमारे ऐब हमें उँगलियों पे गिनवाओ
    हमारी पीठ के पीछे हमें बुरा न कहो
    supar ,khas kar ye sher,,,,,

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  6. यूँ तो सभी अशआर अपने आप में खूबसूरत हैं,
    लेकिन मुझे ये बहुत पसंद आया :

    हमारे ऐब हमें उँगलियों पे गिनवाओ
    हमारी पीठ के पीछे हमें बुरा न कहो

    आभार !

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  7. बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल की प्रस्तुति,शुक्रिया.

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  8. व्बहुत ही सुन्दर शेर,बेहतरीन ग़ज़ल.

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  9. बहुत बढ़िया ग़ज़ल.....
    बेहतरीन शेर!!

    अनु

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  10. सकारात्मक सोंच से सजी सुन्दर गजल की प्रस्सतुति हेतु आपको सादर बधाई।

    जवाब देंहटाएं
  11. ये और बात कि दुश्मन हुआ है आज मगर
    वो मेरा दोस्त था कल तक उसे बुरा न कहो

    ...वाह! बेहतरीन ग़ज़ल...

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