गुरुवार, 9 मई 2013

"मेरी विवशता"





मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
पथ ही मुड़ गया था.
गति मिली, मैं चल पड़ा,
पथ पर कहीं रुकना मना था
राह अनदेखी, अजाना देश,
संगी अनसुना था.
चाँद सूरज की तरह चलता,
न जाना रात दिन है
किस तरह हम-तुम गए मिल,
आज भी कहना कठिन है.
तन न आया माँगने अभिसार
मन ही जुड़ गया था
मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
पथ ही मुड़ गया था.
देख मेरे पंख चल, गतिमय
लता भी लहलहाई
पत्र आँचल में छुपाये
मुख-कली भी मुस्कुराई
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एक क्षण को थम गए डैने
समझ विश्राम का पल
पर प्रबल संघर्ष बनकर
आगई आंधी सदल-बल
डाल झूमी, पर न टूटी
किंतु पंछी उड़ गया था
मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
पथ ही मुड़ गया था.
************************
ध्यान तक विश्राम का पथ पर महान अनर्थ होगा,
ऋण न युग का दे सका तो जन्म लेना व्यर्थ होगा।

                              सादर आभार:शिवमंगल सिंह 



31 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन बहुत ही सुंदर भावपूर्णरचना... !!

    जवाब देंहटाएं
  2. आपने लिखा....
    हमने पढ़ा....
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए शनिवार 11/05/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    पर लिंक की जाएगी.
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है .
    धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  3. अतीव सुन्दर कृति स्व. शिवमंगल सिंह का प्रभाव भी पद्धिति में साफ दृष्टिगोचर होता है ...वल्कि उनसे भी कहीं उन्नल ऊर्जा प्रवाह के लिये लिये साधुवाद rajendr prasad ji

    जवाब देंहटाएं
  4. अतीव सुन्दर कृति स्व. शिवमंगल सिंह का प्रभाव भी पद्धिति में साफ दृष्टिगोचर होता है ...वल्कि उनसे भी कहीं उन्नल ऊर्जा प्रवाह के लिये लिये साधुवाद rajendr prasad ji

    जवाब देंहटाएं
  5. तन न आया माँगने अभिसार
    मन ही जुड़ गया था
    मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
    पथ ही मुड़ गया था..........SUNDAR BHAAV..
    http://boseaparna.blogspot.in/

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  6. तन न आया माँगने अभिसार
    मन ही जुड़ गया था
    मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
    पथ ही मुड़ गया था...........बहुत गहन।

    जवाब देंहटाएं
  7. बहुत ही सार्थक कविता का सृजन,आभार.

    जवाब देंहटाएं
  8. बेहतरीन कविता सुन्दर भाव लिए.

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  9. बड़ा ही उत्कृष्ट भावपूर्ण रचना.

    जवाब देंहटाएं
  10. मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
    पथ ही मुड़ गया था.

    बहुत सुन्दर भाव.

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  11. डाल झूमी, पर न टूटी
    किंतु पंछी उड़ गया था

    ...बहुत गहन और सुन्दर प्रस्तुति...

    जवाब देंहटाएं
  12. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (10-05-2013) के "मेरी विवशता" (चर्चा मंच-1240) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  13. बहुत गहराई मे लिखा है भाई ,,,,मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
    पथ ही मुड़ गया था.

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  14. bahut sundar rachna hai, rajendra ji. baar-baar padhne par bhi man nahin bharta. mujhe garv hai ki main aapka mitra hun.

    जवाब देंहटाएं
  15. बहुत सुन्‍दर रचना, सुन्‍दर भाव प्रस्‍तुति आभार
    हिन्‍दी तकनीकी क्षेत्र कुछ नया और रोचक पढने और जानने की इच्‍छा है तो इसे एक बार अवश्‍य देखें,
    लेख पसंद आने पर टिप्‍प्‍णी द्वारा अपनी बहुमूल्‍य राय से अवगत करायें, अनुसरण कर सहयोग भी प्रदान करें
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