मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

धूम्रपान है दुर्व्यसन


धूम्रपान है दुर्व्यसन, मुँह में लगती आग।
स्वास्थ्य, सभ्यता, धन घटे, कर दो इसका त्याग।।
बीड़ी-सिगरेट पीने से, दूषित होती वायु।
छाती छननी सी बने, घट जाती है आयु।।
रात-दिन मन पर लदी, तम्बाकू की याद।
अन्न-पान से भी अधिक, करे धन-पैसा बरबाद।।
कभी फफोले भी पड़ें. चिक1 जाता कभी अंग।
छेद पड़ें पोशाक में, आग राख के संग।।
जलती बीड़ी फेंक दीं, लगी कहीं पर आग।
लाखों की संपदा जली, फूटे जम के भाग।।
इधर नाश होने लगा, उधर घटा उत्पन्न।
खेत हजारों फँस गये, मिला न उसमें अन्न।।
तम्बाकू के खेत में, यदि पैदा हो अन्न।
पेट हजारों के भरे, मन भी रहे प्रसन्न।।
करे विधायक कार्य, यदि बीड़ी के मजदूर।
तो झोंपड़ियों से महल, बन जायें भरपूर।।
जीते जी क्यों दे रहे, अपने मुँह में आग।
करो स्व-पर हित के लिए, धूम्रपान का त्याग।।

1. अचानक होने वाला दर्द

रविवार, 28 अप्रैल 2013

धरती माँ


ठीक है, तुम खूब शरारतें करो,
दीवारों और ऊंचे वृक्षों पर चढो,
अपनी साइकलों को जिधर चाहो घुमाओ-फिराओ,
तुम्हारे लिए यह जानना अनिवार्य है
कि तुम इस काली धरती पर
किस प्रकार बना सकते हो अपना स्वर्ग
तुम चुप कर दो उस व्यक्ति को
जो तुम्हें पढाता है कि यह सृष्टि
आदम से प्रारम्भ हुई
तुम्हें धरती के महत्त्व को स्वीकारना है.
तुम्हें विश्वास करना है कि धरती शाश्वत है.
अपनी माँ और धरती माँ में कभी भेद मत करना
इस से उतना ही प्यार करना
जितना अपनी माँ से करते हो. 


चलते चलते......

चादर पर इंसानियत की गहरा दाग लगाया है
जिसकी दवा मुमकिन ही नहीं वह ज़ख्‍म जहां से पाया है


                                                                      आभार - नाज़िम हिकमत

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

"धरा बचायें: हाइकू"





१.
पृथ्वी की गोद
पेड़ों की हरियाली
सूनी पड़ी है

२.
कटते वृक्ष
बढ़ता प्रदुषण
चिन्ता सताए

३.
रोती जमीन
प्रकृति की लाचारी
जख्मी आँचल

४.
उड़ते मेघ
सींचे कैसे धरती
सुखी नदियाँ

५.
सुनी बगिया
कोयल भी खामोश
खो गयी कहाँ

६.
थके पथिक
छाया को तरसते
मिली न छाया

७.
वन से जल
जल से है जीवन
इसे बचायें

८.
जल जीवन
जल है तो कल है
सभल जाएँ

९.
गंगा-यमुना
होती है रोज मैली
रखें निर्मल

१०.
लगायें पेड़
फैलायें हरियाली
धरा बचायें



"हम सभी जो कि इस स्वच्छ श्यामला धरा के रहवासी हैं हमारा यह दायित्व है कि दुनिया में क़दम रखने से लेकर आखिरी साँस तक हम पर प्यार लुटाने वाली इस धरा को बचाए रखने के लिए जो भी कर सकें करें, क्योंकि यह वही धरती है जो हमारे बाद भी हमारी निशानियों को अपने सीने से लगाकर रखेगी। लेकिन यह तभी संभव होगा जब वह हरी-भरी तथा प्रदूषण से मुक्त रहे और उसे यह उपहार आप ही दे सकते हैं। "

गुरुवार, 25 अप्रैल 2013

"हैवानियत का आलम'





चारों तरफ अजीब आलम हादसों में पल रही है जिंदगी,
फूलों  के  शक्ल में अंगारों  पर चल  रही है  जिंदगी.

आदमी  खूंखार  वहसी  हो  गए हैं इस जमाने में,
दूध साँपों को पिलाकर खुद तड़प रही है जिंदगी.

हमारी कौम ने जो बाग सींचे थे अपना लहू देकर,
उन्हीं बाग के कलियों का मसलना देख रही है जिंदगी.

उजड रहे हैं रोज गुलशन अब कोई नजारा न रहा,
तलवारों खंजरों रूपी दरिंदों से लुट रही है जिंदगी.

अब  तो यातनाओं  के अंधेरों में ही होता है सफर,
लुट रही बहन-बेटियाँ असहाय बन गयी है जिंदगी.

हर पल सहमी-सहमी है घर की आबरू बहन-बेटियाँ,
हर तरफ  हैवानियत का आलम नीलम ही रही है जिंदगी.

चुभती है  कविता ग़ज़ल सुनाने का न रहा अब हौसला,
 अब तो इस जंगल राज में कत्लगाह बन गयी है जिन्दगी.

सोमवार, 15 अप्रैल 2013

ज़ख़्मों का आईना


   
हर एक चेहरे को ज़ख़्मों का आईना न कहो
ये ज़िन्दगी तो है रहमत इसे सज़ा न कहो
 
न जाने कौन सी मज़बूरियों का क़ैदी हो
 वो साथ छोड़ गया है तो बेवफ़ा न कहो

तमाम शहर ने नेज़ों पे क्यूँ उछाला मुझे
 ये इत्तेफ़ाक़ था तुम इस को हादसा न कहो

ये और बात कि दुश्मन हुआ है आज मगर
 वो मेरा दोस्त था कल तक उसे बुरा न कहो

हमारे ऐब हमें उँगलियों पे गिनवाओ
 हमारी पीठ के पीछे हमें बुरा न कहो

मैं वाक़ियात की ज़न्जीर का नहीं क़ायल
 मुझे भी अपने गुनाहों का सिलसिला न कहो

ये शहर वो है जहाँ राक्षस भी हैं बहुत
 हर एक तराशे हुए बुत को देवता न कहो

चलते चलते --
अब फिरते हैं हम रिश्तों के रंग-बिरंगे ज़ख्म लिये
सबसे हँस कर मिलना-जुलना बहुत बड़ी बीमारी है


(सादर आभार:राहत इन्दौरी)

रविवार, 14 अप्रैल 2013

कुछ यादगार



याद नहीं क्या क्या देखा था, सारे मंज़र भूल गये

उसकी गलियों से जब लौटे, अपना भी घर भूल गये

खूब गये परदेस कि अपने दीवारो-दर भूल गये

शीशमहल ने ऐसा घेरा, मिट्टी के घर भूल गये

************

रात यूं दिल में तेरी खोई हुई याद आई

जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए

जैसे सहाराओं में हौले से चले बादे-नसीम

जैसे बीमार को बेवजह करार आ जाए


************
लायी हयात आये कज़ा ले चली चले

ना अपनी ख़ुशी आये ना अपनी ख़ुशी चले

दुनिया ने किसका राहे-फ़ना में दिया है साथ

तुम भी चले चलो यूं ही जब तक चली चले

कम होंगे इस बिसात पे हम जैसे बदकिमार
जो चाल हम चले वो निहायत बुरी चले

*************






शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

संगत का असर

संगत का असर सब कुछ बदल देता है। संगत अर्थात् दोस्ती, मित्रता, साथ है। संगत के कारण चाल-ढाल, पहरावा, खानपान, बात करने का तरीका, चरित्र सब कुछ में बदलाव आ जाता है।इसी बात को हम एक कहानी द्वारा देखते हैं.
एक बार एक राजा शिकार के लिए अपने काफिले के साथ किसी जंगल से गुजर रहा था. दूर-दूर तक शिकार नजर नहीं आ रहा था. वे धीरे-धीरे घनघोर जंगल में प्रवेश करते गये. उन्हें कुछ डाकुओं के छिपने की जगह दिखायी दी. पास पहुंचे तो पेड़ पर बैठा तोता बोल पड़ा, ‘‘पकड़ो-पकड़ो एक राजा आ रहा है. इसके पास बहुत सारा सामान है. लूटो-लूटो.’’


तोते की आवाज सुन कर सभी डाकू राजा की और दौड़ पड़े. डाकुओं को अपनी और आते देख कर राजा और उसके सैनिक दौड़ कर भाग खड़े हुए. भागते-भागते कोसों दूर निकल गये. सामने एक बड़ा-सा पेड़ दिखायी दिया. कुछ देर सुस्ताने के लिए उस पेड़ के पास चले गये. जैसे ही पेड़ के पास पहुंचे कि उस पेड़ पर बैठा तोता बोल पड़ा, ‘‘आइए राजन, हमारे साधु महात्मा की कुटी में आपका स्वागत है. अंदर आइए, पानी पीजिए और विश्रम कर लीजिए.’’


तोते की इस बात को सुन कर राजा हैरत में पड़ गया और सोचने लगा कि एक ही जाति के दो प्राणियों का व्यवहार इतना अलग-अलग कैसे हो सकता है. राजा को कुछ समझ नहीं आ रहा था. वह तोते की बात मान कर अंदर साधु की कुटिया की ओर चला गया. साधु-महात्मा को प्रणाम कर उनके समीप बैठ गया और अपनी सारी कहानी सुनायी, फिर पूछा, ‘‘ऋषिवर इन दोनों तोतों के व्यवहार में आखिर इतना अंतर क्यों है ?’’


साधु महात्मा बोले, ‘‘ये कुछ नहीं राजन, बस संगति का असर है. डाकुओं के साथ रह कर तोता भी डाकुओं की तरह व्यवहार करने लगा है और उनकी ही भाषा बोलने लगा है. जो जिस वातावरण में रहता है, वह वैसा ही बन जाता है. मूर्ख भी विद्वानों के साथ रह कर विद्वान बन जाता है और अगर विद्वान भी मूर्खो की संगत में रहता है, तो उसके अंदर भी मूर्खता आ जाती है.
सच बात तो यह है की संगत का प्रभाव हर मनुष्य पर होता है। इसलिए हमेशा ऐसी संगत ढूँढें जिससे हमारे मन में कभी बुरे विचार न पैदा न हों। क्योंकि हम चाहें या न चाहें जिस भी व्यक्ति से हम संपर्क करते हैं उसकी बातों का प्रभाव हम पर पड़ता है। अगर हम किसी कामी, व्यसनी, परनिंदक व्यक्ति से संपर्क रखते हैं तो स्वयं अपने अन्दर ही तकलीफ अनुभव होती है यह अलग बात है की अपने अज्ञान की वजह से उसे देख नहीं पाते हैं। इसके विपरीत कुछ लोगों को देखकर अच्छा लगता है क्योंकि अपने गुणों के कारण उनमें आकर्षण होता है। इसलिए हमेशा बेहतर लोगों की संगत करना चाहिए।
कबीर संगत साधु की, जौ की भूसी खाय |खीर खीड भोजन मिलै, साकट संग न जाय ||.......संत कबीर दास जी कहते हैं कि साधु की संगत में अगर भूसी भी मिलै तो वह भी श्रेयस्कर है। खीर तथा तमाम तरह के व्यंजन मिलने की संभावना हो तब भी दुष्ट व्यक्ति की संगत न करें।
                                                                    दुष्ट लोगों की संगत का दुष्परिणाम भोगना ही पड़ता है यह एक ऐसा सत्य है जिसे झुटलाया नहीं जा सकता | सज्जन पुरुष और दुष्ट का कोई मेल नहीं और जब भी यह मिले कीचड़ सज्जन पुरुष पे अवश्य पड़ता है | आज कल एक होड़ सी लगी रहते है कि कैसे पैसे वालों से सम्बन्ध बनाये जाएं, कैसे समाज के ताक़तवर लोगों से सम्बन्ध बनाये जाएं | ऐसे चक्करों में यदि कोई सज्जन पुरुष दुनिया कि देखा देखि पड़ गया तो दुष्परिणाम भोगना ही पड़ता है |

रहिमन उजली प्रकृति को, नहीं नीच को संग ।
करिया वासन कर गहे, कालिख लागत अंग ॥

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

आने का शुक्रिया



चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया
पत्थर को बुत की शक्ल में लाने का शुक्रिया 
        
जागा रहा तो मैंने नए काम कर लिए
ऐ नींद आज तेरे न आने का शुक्रिया


सूखा पुराना जख्म नए को जगह मिली
स्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया 
        
आती न तुम तो क्यों मैं बनाता ये सीढ़ियाँ
दीवारों, मेरी राह में आने का शुक्रिया


आँसू-सा माँ की गोद में आकर सिमट गया
नजरों से अपनी मुझको गिराने का शुक्रिया 
        
अब यह हुआ कि दुनिया ही लगती है मुझको घर
यूँ मेरे घर में आग लगाने का शुक्रिया
                                           

गम मिलते हैं तो और निखरती है शायरी
यह बात है तो सारे जमाने का शुक्रिया
चलते चलते...    
  

बोलो फिर कैसे कटे, यह जीवन की रात
सुना रहा है हर कोई, बस मुर्दों की बात.
आभार-कुँअर बेचैन



"आप सब को नव सवंत्सर २०७० की हार्दिक मंगलकामनायें"

सोमवार, 8 अप्रैल 2013

"आलोचक-आपका मार्गदर्शक "


एक धनवान व्यक्ति भेंगा था. उसे अपनी आंखों के दोष का पता न था. एक दिन उसने दर्पण में देखा कि उसकी आंखों की बनावट दूसरे व्यक्तियों से भिन्न तथा खराब है. उसे लगा दर्पण खराब है. दूसरे दर्पण में देखा, उसमें भी आंखों में दोष दिखायी दिया. उस व्यक्ति को क्रोध आ गया. जिस दर्पण में भी उसे अपनी आंखें दोषपूर्ण दिखती, वह उन सभी दर्पणों को तुड़वा देता. घर के सारे दर्पण तोड़ दिये गये थे. कुछ दिन तक ऐसा ही चलता रहा. जहां दर्पण मिलता, वह उसे तोड़ देता.
एक दिन उसके मित्र ने उससे दर्पण तोड़ने का कारण पूछा. कारण सुनने के बाद मित्र ने कहा,‘‘भाई कमी दर्पण में नहीं, तुम्हारी आंखों में है. दर्पण में जो दिखता है, वह तो प्रतिबिंब मात्र है.
                       कहने का मतलब कि यदि कोई आलोचना करे, तो आलोचक में कमी न देख, आत्ममंथन कर जरूरी सुधार करें. यदि कोई आपकी आलोचना कर रहा है तो इसका मतलब यह नहीं है कि आपमें वाकई कोई दोष या कमी है. आलोचना का एक पक्ष यह भी हो सकता है कि आपके आलोचक आपसे कुछ भिन्न विचार रखते हों. अमेरिकी राजनेता एलेनर रुजवेल्ट के अनुसार कोई आपको तब तक नीचा नहीं दिखा सकता, जब तक कि स्वयं आपकी उसके लिए सहमति न हो. घर हो या बाहर, ऐसी कोई जगह नहीं है, जहां आपको आलोचना का सामना न करना पड़े. हर क्षेत्र में और हर जगह यह एक आम बात है.
                         यह कभी स्वस्थ तरीके से की जाती है तो कभी बीमार मानसिकता से भी. ठीक इसी तरह इसे ग्रहण करने की बात भी है. कुछ लोग इसे स्वस्थ मन से स्वीकार करते हैं और कुछ इसी से अपने मन को बीमार बना लेते हैं. कुछ ऐसे भी होते हैं जो सुनते हैं, अगर उन्हें लगता है कि बात सही है तो गुनते हैं, वरना ठहाका लगाते हैं और आगे बढ़ जाते हैं.
किसी की आलोचना का आप पर कैसा असर होता है, यह बहुत हद तक आपके नजरिये पर निर्भर है. इस नजरिये से ही यह तय होता है कि आप अपनी जिंदगी में किस हद तक सफल होंगे. इसीलिए सजग लोग आलोचना को भी अपने व्यक्तित्व विकास की योजना का एक जरूरी हिस्सा बना लेते हैं.
- बात पते की
* कोई आपको तब तक नीचा नहीं दिखा सकता, जब तक कि स्वयं आपकी उसके लिए सहमति न हो.
* इसीलिए सजग लोग आलोचना को भी अपने व्यक्तित्व विकास की योजना का एक जरूरी हिस्सा बना लेते हैं.

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

माँ की ममता :हाइकू








१.
माँ का आँचल 
कोमल अहसास

सदा पावन

२.

माँ का दुलार

ममता भरी छावं 

सुखद यादें 
३.
माँ से जीवन 
तन मन हरसे 
खुशियाँ लाये
४.
माँ क्या होती है ?
दया की प्रतिमूर्ति 
अमर  स्रोत 
५.
दूध का कर्ज 
ऋण है जीवन में
अनमोल है 

६.
बरसो बीते 
माँ से बिछड़ते 
दर्द में डूबे 
७.
रक्षा करता 

बीच मझधार में

माँ का आशीष 




"माँ पर कुछ लिखना आसान नहीं होता, लेकिन यह भी है कि माँ पर लिखना सबसे ज्यादा हीं संतोषप्रद होता है।"

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

(कन्या भ्रूण-हत्या एक जघन्य अपराध)







प्रत्येक शुभ कार्य में हम कन्या पूजन करते हैं, लेकिन बड़ा सवाल है कि उसी कन्या को हम जन्म से पहले ही मारने का पाप क्यों करते हैं? आज समाज के बहुत से लोग शिक्षित होने के बावजूद कन्या भूर्ण हत्या जैसे घृणित कार्य को अंजाम दे रहे हैं। जो आंचल बच्चों को सुरक्षा देता है, वही आंचल कन्याओं की गर्भ में हत्या का पर्याय बन रहा है।हमारे देश की यह एक अजीब विडंबना है कि सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद समाज में कन्या-भ्रूण हत्या की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। समाज में लड़कियों की इतनी अवहेलना, इतना तिरस्कार चिंताजनक और अमानवीय है। जिस देश में स्त्री के त्याग और ममता की दुहाई दी जाती हो, उसी देश में कन्या के आगमन पर पूरे परिवार में मायूसी और शोक छा जाना बहुत बड़ी विडंबना है।आज भी शहरों के मुकाबले गांव में दकियानूसी विचारधारा वाले लोग बेटों को ही सबसे ज्यादा तव्वजो देते हैं, लेकिन करुणामयी मां का भी यह कर्तव्य है कि वह समाज के दबाव में आकर लड़की और लड़का में फर्क न करे। दोनों को समान स्नेह और प्यार दे। दोनों के विकास में बराबर दिलचस्पी ले। बालक-बालिका दोनों प्यार के बराबर अधिकारी हैं। इनके साथ किसी भी तरह का भेद करना सृष्टि के साथ खिलवाड़ होगा।
                               साइंस व टेक्नॉलोजी ने कन्या-वध की सीमित समस्या को, अल्ट्रासाउंड तकनीक द्वारा भ्रूण-लिंग की जानकारी देकर, समाज में कन्या भ्रूण-हत्या को व्यापक बना दिया है। दुख की बात है कि शिक्षित तथा आर्थिक स्तर पर सुखी-सम्पन्न वर्ग में यह अतिनिन्दनीय काम अपनी जड़ें तेज़ी से फैलाता जा रहा है।1995 में बने जन्म पूर्व नैदानिक अधिनियम नेटल डायग्नोस्टिक एक्ट 1995 के मुताबिक बच्चे के लिंग का पता लगाना गैर कानूनी है। इसके बावजूद इसका उल्लंघन सबसे अधिक होता है.अल्ट्रासाउंड सोनोग्राफी मशीन या अन्य तकनीक से गर्भधारण पूर्व या बाद लिंग चयन और जन्म से पहले कन्या भ्रूण हत्या के लिए लिंग परीक्षण करना, करवाना, सहयोग देना, विज्ञापन करना कानूनी अपराध है।
लेकिन यह स्त्री-विरोधी नज़रिया किसी भी रूप में गरीब परिवारों तक ही सीमित नहीं है. भेदभाव के पीछे सांस्कृतिक मान्यताओं एवं सामाजिक नियमों का अधिक हाथ होता है. यदि इस प्रथा को बन्द करनी है तो इन नियमों को ही चुनौती देनी होगी.कन्या भ्रूण हत्या में पिता और समाज की भागीदारी से ज्यादा चिंता का विषय है इसमें मां की भी भागीदारी. एक मां जो खुद पहले कभी स्त्री होती है, वह कैसे अपने ही अस्तितव को नष्ट कर सकती है और यह भी तब जब वह जानती हो कि वह लड़की भी उसी का अंश है. औरत ही औरत के ऊपर होने वाले अत्याचार की जड़ होती है यह कथन पूरी तरह से गलत भी नहीं है. घर में सास द्वारा बहू पर अत्याचार, गर्भ में मां द्वारा बेटी की हत्या और ऐसे ही कई चरण हैं जहां महिलाओं की स्थिति ही शक के घेरे में आ जाती है.औरतों पर पारिवारिक दबाव को भी इन्कार नहीं किया जा सकता.

 खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो
आने  दो रे आ ने  दो, उन्हें इस  जीवन  में आने  दो

भ्रूणहत्या का पाप हटे, अब ऐसा  जाल बिछाने  दो
खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो

मन के इस संकीर्ण भाव को, रे मानव मिट जाने दो
खिलने दो खुशबू पहचानो, कलियों को मुसकाने दो
                                                                                                               (भाउक जी कुछ पंक्तियाँ)
(आइये एक संकल्प लेते हैं ,कन्या भ्रूण -हत्या एक जघन्य अपराध है ,हम सभी को मिलकर साँझा प्रयत्नों एवं जन जाग्रती द्वारा इस कु -कृत्य को जड़ से उखाड़ने के समस्त प्रयत्न  करेंगें  !यही समय की मांग है !!)
                                                                    

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

"खुली आँखों से ख्वाब"





                                                                                                                                                                 
देखता रहा,
खुली  आँखों से ख्वाब
जहां में फैली हुई
हैवानियत के मंजरों को
हर पल होते हुए
कत्ल,चोरी.रहजनी और दुराचार को 
सुख-चैन लूटते हाथों से
मिलती ब्यथाएं अनतुली
थरथराती बुनियादें
दम बेदम फरियादें
खौफ का एहसास कराती
खून से लथपथ हवायें
शाम होते ही
सिमटते सारे रास्ते
मची है होड़ हर तरफ
धोखा,झूठ,फरेब और बेईमानी की
नेकी की राहों में फैली
बिरानगीं और तीरगी का बसेरा
पहलू बदल कर ली अंगडाई
पर न कोई इन्कलाब दिखा
जी रहे हैं सभी यहाँ
आपसी रंजिसों के साथ
भला कब तक ?
ये भी कोई जीना है.
                                                                                                  

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